शनिवार की रात-अमिताभ के साथ
वे दोनों अक्सर साथ ही रहती थी। जैसे आपका मन किया कि आज सिर्फ़ अकेली मिनी को देखना है गोलगप्पे खाते हुए, जब एक बड़ा सा गोलगप्पा मुँह में भरे हुए उसका पानी उसके होठों के बीच से चोरी चोरी बाहर निकल रहा हो, ठीक उस क्षण या तब, जब रंगरेज़ के सामने खड़ी होकर वह दो उंगलियों के बीच फंसी कतरन में एक हल्की सी डार्क मैरून शेड पर ज़ोर देकर उससे गलत रंग में दुपट्टा रंग देने पर झगड़ रही हो, तो अच्छी खासी संभावना है कि ऐसे मन को आपको महीनों तक मसोसकर रखना पड़े।
ऐसा होता था कि मिनी
गोलगप्पा खा रही होती थी तो फ़्रेम में उसकी कटोरी में से पानी पी रही नीलम ज़रूर
होती थी या मिनी दुकान वाले से झगड़ रही होती थी तो उसके पास बड़ी सी पॉलीथीन लेकर
खड़ी नीलम रिक्शे वालों को रोक रोककर सतबाग का किराया पूछ रही होती थी। उन्हें अलग
अलग देख लेना कस्बे की ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाने लायक घटना तो ज़रूर थी। कई लड़के मिनी
या नीलम के एक हफ़्ते के अन्दर एक बार अकेले दिख जाने की शर्त लगाकर हार चुके थे और
ऐसा भी नहीं था कि वे बाहर कम निकलती थीं। दिन में गोलबाज़ार के दो चक्कर तो पक्के ही
थे लेकिन एक दूसरी के बिना?
शायद कभी नहीं।
वैसे कुछ लोगों को इसमें फ़ायदा भी नज़र आता था। जैसे मेरे कटपीस वाले दोस्त संजय का कहना था कि इस बहाने दो माल एक साथ देखने को मिलते हैं और अगर किस्मत से वे आपकी दुकान में आ गईं तो दुगुनी बिक्री भी पक्की। नीलम को अगर जयपुरी कढ़ाई वाला कपड़ा पसन्द आया तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि मिनी कुछ न खरीदे या कुछ और खरीदे। वे दोनों ‘मेड फॉर ईच अदर’ टाइप थीं।
वैसे कुछ लोगों को इसमें फ़ायदा भी नज़र आता था। जैसे मेरे कटपीस वाले दोस्त संजय का कहना था कि इस बहाने दो माल एक साथ देखने को मिलते हैं और अगर किस्मत से वे आपकी दुकान में आ गईं तो दुगुनी बिक्री भी पक्की। नीलम को अगर जयपुरी कढ़ाई वाला कपड़ा पसन्द आया तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि मिनी कुछ न खरीदे या कुछ और खरीदे। वे दोनों ‘मेड फॉर ईच अदर’ टाइप थीं।
मिनी स्टेट बैंक में
नौकरी करती थी (यह मुझे पता नहीं कि किस पोस्ट पर थी। वैसे भी बैंक में काम करने वाले सब
लोग मुझे एक ही पद पर एक सा काम करते हुए लगते हैं), लेकिन होमसाइंस कॉलेज के
गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी। नीलम उसी कॉलेज में पढ़ती थी और उसी हॉस्टल में रहती
थी। मिनी हाज़िरजवाब थी और थोड़ी गरम मिजाज भी। हॉस्टल की लड़कियों ने नीलम के अलावा
किसी से भी उसे सीधे मुँह बात करते नहीं देखा था। नीलम शांत थी और सुन्दर भी। इन
दोनों में से ही कोई वज़ह रही होगी कि एक रात अचानक ग्यारह बजे मुझे उसकी याद आने
लगी और तड़के चार बजे तक मैं सो नहीं पाया। सुबह सात दस पर ब्रश करते हुए मुझे
अचानक लगा कि मुझे उससे प्यार हो गया है। मैंने हड़बड़ी में कुल्ला किया और फिर
परांठे खाते हुए अपना ध्यान उससे हटाने के लिए देर तक ज़ी सिनेमा देखता रहा। वह
शायद शनिवार की रात-अमिताभ के साथ वाली सुबह थी।
वे सुबहें कुछ अलग
सी थीं। मेरे पड़ोस की सुधा ज़िद करके अंग्रेज़ी का ट्यूशन पढ़ने लगी थी और उसके भाई
को अपनी ममेरी बहन से इश्क़ हो गया था। वह एस एम एस का ज़माना नहीं था, लेकिन सुधा
अपने भाई की प्रेमिका के लिए उन दिनों भी उसकी तरफ से अंग्रेज़ी वाली हिन्दी में ख़त
लिखती थी। उसका भाई सिगरेट पीने लगा था और मन्दिर जाने लगा था। मेरे घर आने वाले
अख़बार में राजनीति, चोरी-चकारी तथा गाँव-देहात की ख़बरें कम हो गई थीं और उनका
स्थान ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ की रसीली गपशप ने ले लिया था। उन दिनों मुझे
रणवीर शौरी की किस्मत से रश्क़ होता था। नींद पूरी हो जाने पर भी कुछ खास सपनों की
प्रतीक्षा में सुबह को लम्बा खींचकर मैं देर से उठने की कोशिश करता था। टीवी पर
व्हिस्पर और स्टेफ़्री नामक कंपनियों के विज्ञापन कुछ ज़्यादा आने लगे थे, जिनमे
लड़के लड़कियाँ एक बहुत ख़ूबसूरत पहाड़ी पर जाकर अंताक्षरी खेलते थे और ‘लागा चुनरी में दाग, छिपाऊँ कैसे’ के बाद ‘स’
से अगला गाना गाने की बजाय एक विश्वसुन्दरीनुमा लड़की हीनभावना से ग्रस्त होकर
रुआँसी हो जाती थी। फिर एक पट्टी पर नीली स्याही डालकर दिखाई जाती थी और लड़की का
खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आता था। जालंधर के खानदानी वैद्य बवेजा जी का कहना था कि
वे खोई हुई जवानी भी तीन हफ़्ते में लौटा सकते हैं। शायद अमिताभ के साथ का असर था
कि मैं तल्लीनता से मनोहर कहानियाँ पढ़ते हुए जगजीत सिंह की ग़ज़लें सुना करता था।
हॉस्टल वाली
लड़कियाँ
एक दिन मैंने उनका
रास्ता रोक लिया। अकेले नीलम से राह में मिल पाना बहुत कठिन काम था, इसलिए बहुत
दिनों तक इंतज़ार करने के बाद आखिरकार मैंने गणेश प्रोविजन स्टोर के ठीक सामने खड़ी
साइकिल को अपनी हड़बड़ी से गिराते हुए ‘सुनिए’ कह ही दिया। नीलम
नज़रें झुकाए हुए चल रही थी और मिनी अपनी बड़ी बड़ी आँखें इधर उधर डुलाते हुए। मिनी
ने ही मेरा क्षीण सा स्वर सुनकर मेरी ओर पहले देखा और प्रश्नवाचक चिन्ह को अपनी
भाव-भंगिमाओं से अभिव्यक्त करती हुई वहीं थम गई। नीलम जब दो तीन कदम आगे जाकर
रुकी, तब तक मिनी मुझसे ‘जी कहिए’ कह चुकी थी। अब मैं जब तक उधर पलटता, जिधर
ठहरी हुई नीलम खड़ी थी, तब तक गणेश प्रोविजन वाले ने आकर मेरा कॉलर पकड़ लिया था। मेरी
टक्कर से गिरी साइकिल उसकी दुकान के बाहर की ओर रखी कोल्ड ड्रिंक की बोतलों पर
गिरी थी और नश्वर बोतलें नीचे गिरकर टूट गई थीं। मैं नीलम के चेहरे के भाव भी नहीं
देख पाया था और दुकान वाला मुझे घसीटकर अपना नुक्सान दिखाने लगा था। वह जो बोल रहा
था, मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी बन्द हुई आँखें वहीं नीलम
से पीठ फेरे खड़ी हैं और उन आँखों का चेहरा कोका कोला की टूटी हुई बदजात बोतलों के
सामने जबरदस्ती खड़ा कर दिया गया है। वे दोनों तुरंत वहाँ से चल दी थीं। मैं उसके
बाद आधे घंटे तक उस दुकान वाले को गालियाँ बकता रहा था। गलती मेरी थी लेकिन जब
झगड़े का अंत हुआ तो मैं गणेश प्रोविजन स्टोर वाले को खरी खोटी सुना रहा था और वह
सिर झुका कर खड़ा था।
शाम को मैंने संजय को पूरी कहानी सुनाई तो उसने दार्शनिकों वाले अंदाज़ में कहा था कि मुझे चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हॉस्टल वाली लड़कियों से सैटिंग करना अपेक्षाकृत आसान होता है और यह तब और भी आसान हो जाता है, जब लड़की का पहले कोई चक्कर न चला हो। उसने बताया कि लड़कियों के हॉस्टल का वातावरण प्रेम कहानियों के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। उदाहरण के लिए एक लड़की का कुछ लफड़ा चल रहा है तो वह दिन भर उसी की बातें करेगी। खाना खाएगी तो बताएगी कि उसके उसे पुलाव कितना पसन्द है और पनीर की सब्जियों की ओर तो वह देख तक नहीं पाता, फ़िल्म देखेगी तो बताएगी कि मुझ से पहले वह सिर्फ़ सुष्मिता सेन से ही प्यार करता था, रोज़ शाम को लौटकर आते ही आसपास के कमरों की लड़कियों को इकट्ठा करके बताएगी कि उसने आज कहाँ कहाँ छुआ, क्या क्या किया। दूसरी लड़कियाँ, जिनका कभी कोई चक्कर नहीं चला, इन बातों को सुनते हुए उनकी पुतलियाँ फैलती सिकुड़ती रहेंगी, कभी आहें भरेंगी, कभी हँसेंगी और उनमें प्यार के प्रति उत्सुकता और उत्तेजना एक्सप्रेस स्पीड से बढ़ेगी। फिर वे अपने आस पास के लड़कों को लाइन देना शुरु करेंगी और जिसका चांस पहले लग गया, वह डांस भी जल्दी ही कर लेगा। फिर उसने अपनी बगल में रखे हुए फ़ोन का रिसीवर उठाकर कान से लगाया और फिर रख दिया। मुझे लगा कि उसने यह व्यस्तता अपनी बात का प्रभाव बढ़ाने के लिए दिखाई है। वाकई मुझ पर प्रभाव बढ़ा भी था। फिर उसने अपनी दुकान की रसीद वाली कॉपी के पन्ने पलटते हुए मुस्कुराकर धीरे से कहा कि लड़कियाँ आपस में एक एक बात शेयर करती हैं और यह एक एक बात ही आग में घी डालती है। मैं संजय के ज्ञान पर गदगद हो गया था और मैंने तभी दो कटिंग चाय मँगवाई थीं। चाय पीते हुए उसने कहा था कि चूंकि वे दोनों दिनभर साथ रहती हैं, इसलिए उनमें से किसी की किसी लड़के से सैटिंग होने का सवाल ही नहीं उठता।
मेरा दिन, जो सुबह
बिगड़ गया था, शाम को संजय ने फिर से बना दिया था। मैं कोई भूला बिसरा गाना
गुनगुनाते हुए घर लौटा और फिर अँधेरा होने तक छत पर टहलता रहा। नीचे आने से पहले मैं
कुछ देर के लिए छत की चारदीवारी पर कुहनी टिकाकर खड़ा हो गया। मैं नीलम के बारे में
सोच रहा था और मेरा चेहरा अनजाने में ही सुधा के घर की ओर था। मैं भी अँधेरे में
खड़ा था और उसके घर में भी घुप्प अँधेरा था। फिर अचानक उसके कमरे की बत्ती जली तो
मेरा ध्यान उधर चला गया। यदि परदे न लगाए जाएँ तो उसका कमरा मेरी छत से बिल्कुल
साफ दिखता था। उस दिन भी शायद वह परदे लगाना भूल गई थी। वह कुर्सी उठाकर लाई थी और
उसका अंग्रेज़ी का मास्टर कमरे के दरवाज़े के पास खड़ा था। फिर वह कुर्सी पर बैठ गया
और सुधा उसके सामने बेड पर बैठ गई। सुधा का चेहरा और मास्टर की पीठ मेरी तरफ थी। फिर
मास्टर ने उसे कुछ कहा तो वह उठकर कमरे से बाहर निकली और तेजी से सदर दरवाजे की ओर
गई। फिर दरवाजा बन्द करने की आवाज़ सुनाई दी। घर में शायद कोई और नहीं था। वह तेजी
से लौटी और फिर वहीं बेड पर बैठ गई। सुधा सोलह सत्रह साल की थी और उसका ट्यूटर
अठाइस उनतीस का रहा होगा।
छिकु मिकु छत्तीस
यानी छ: बजे गोलबाजार में मिलो
मैं उनके हॉस्टल के
नम्बर पर फ़ोन मिलाता था तो वॉर्डन उठाती थी। उसकी आवाज़ से ऐसा लगता था कि वह
हॉस्टल वॉर्डन बनकर ही पैदा हुई होगी और उसकी सुहागरात पर उसके पति ने घूंघट उठाया
होगा तो घूंघट के पीछे वह मोटे काँच वाला चश्मा लगाकर हॉस्टल का आगंतुक रजिस्टर ही
देख रही होगी। जाहिर था कि उसने कभी नीलम से बात नहीं करवाई। इसी बीच मैंने
होमसाइंस कॉलेज के एक लेक्चरर से जान पहचान बढ़ा ली थी। वैसे मैंने कुछ नहीं किया
था। जो कुछ कमाल किया था, संजय ने ही मेरे लिए किया था। उसका नाम अनुराग था और वह
अक्सर संजय की दुकान पर आया करता था।
उदासी एक अलग ही
किस्म का नशा है। बाकी नशे सुकून देते हैं, संतुष्टि देते हैं, जीवन के प्रति
आस्था पैदा करते हैं, नशे के प्रति लगाव पैदा करते हैं जबकि उदासी वैराग्य जगाती
है, उदासी से दूर भाग जाने की इच्छा जगाती है और एक प्यास बढ़ाती रहती है। उदासी
धरती की सबसे पुरानी धरोहर होगी। यह प्यार से हज़ारों साल पुरानी होगी।
मेरे जीवन में सब
कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि मैं अचानक उदास रहने लगा। मुझे उदास रहना प्यार करने
से ज़्यादा अच्छा लगने लगा। सोने से भी ज़्यादा। मैंने टीवी देखना भी बन्द कर दिया
था और किसी से मिलना जुलना भी। संजय भी एक दो बार मिलने आया और मैंने मिलने से मना
कर दिया तो वह भी अपनी दुनिया में मग्न हो गया।
तभी एक दिन मिनी ने
मेरे घर फ़ोन किया। नहीं, इस तरह कहना ठीक नहीं होगा। मेरे फ़ोन पर एक ब्लैंक कॉल आई
और उधर की ख़ामोशी को सुनकर न जाने मुझे क्यों लगा कि फ़ोन मिनी ने किया है। मैंने ‘सुनिए’ और ‘जी कहिए’ के अलावा उससे कभी बात नहीं की थी, लेकिन उस
पचास पचपन सेकंड की चुप्पी को सुनकर मुझे लगा कि उधर मिनी ही है। शाम को फिर एक
ऐसा ही फ़ोन आया और पचास पचपन सेकंड पूरे होने से पहले ही मैंने पूछ लिया – तुम मिनी हो ना?
फ़ोन तुरंत कट गया।
मैं सोचता रहा कि मुझे क्यों लग रहा है कि ये कॉल मिनी ने किए थे, लेकिन कोई कारण
नहीं मिला।
उसी शाम कोई दरवाज़े
के नीचे से एक कागज़ का पुर्जा सरका गया, जिस पर लिखा था- छ: बजे गोलबाजार में
मिलो। मैंने तुरंत दरवाज़ा खोलकर बाहर गली में देखा। कुछ बच्चे खेल रहे थे और एक
सब्जी वाला जा रहा था। मैंने घड़ी देखी, छ: बजने में पच्चीस मिनट थे। मैंने फिर से
कागज़ देखा। काली स्याही से जल्दबाज़ी में लिखा गया था। मैं कोई हैंडराइटिंग
एक्सपर्ट नहीं था, लेकिन मुझे वह किसी स्त्री के हाथों की लिखाई लगी। शायद यह मेरी
ख़ुशफ़हमी ही हो।
मैंने जींस पहनी, बाल कुछ ठीक किए और ताला लगाकर निकल गया। उस दिन गोलबाज़ार में बाकी दिनों से अधिक भीड़ थी। ऐसा लग रहा था कि शहर भर के घरों में किसी ने ऐसा ही ‘छ: बजे गोलबाजार में मिलो’ पुर्जा फेंक दिया हो और सबने फिर तेजी से अपने घर से बाहर निकलकर देखा हो। शायद किसी ने भागकर सड़क पार करती हुई कोई लड़की भी देख ली हो। कोई महज़ उसका उड़ता हुआ दुपट्टा देख पाया हो या किसी की दहलीज के पास गीली मिट्टी हो और वह तेजी से शीशे के सामने रखा तीखे दाँतों वाला कंघा ढूंढ़ने से पहले देर तक उस मिट्टी में उकडूं बैठकर ऊँची एडी की सैंडल के चार निशान देखता रहा हो। कोई घड़ी देख रहा था, कोई अपनी जेब से कागज़ निकालकर देखता था और फिर कहीं भी मुड़ जाता था, कोई अचानक रुककर किसी लड़की से बातें करने लगता था। बहुत सारे लोग मुझे अपने जैसे ही लगने लगे। एक बच्चा छ: का पहाड़ा जोर जोर से दोहराते हुए मेरी बगल से गुजरा। मैंने तेज चलकर उसे पकड़ लिया। वह डर सा गया और मेरी पकड़ से छूटने का यत्न करने लगा।
- क्या बोल रहे हो
बेटा?
- छिकु मिकु
छत्तीस...
और वह छूटकर भाग
गया। मैं हारकर एक फलूदे वाले के पास रखे स्टूल पर बैठ गया। छ: बजकर पाँच मिनट हुए
थे। मुझे अपने आप पर गुस्सा आया कि मैं क्यों किसी की शरारत पर यहाँ आ गया हूं।
किसी को मिलना होता तो वह इतने बड़े गोलबाज़ार का पता नहीं देता। अब वह मुझे कहाँ
ढूंढ़ेगा और मैं उसे कहाँ ढूंढ़ूंगा?
फिर भी मैं साढ़े छ: तक वहाँ बैठ कर किसी के आ जाने की प्रतीक्षा करता रहा। फिर आखिरकार झुंझलाकर संजय की दुकान पर आ गया।
फिर भी मैं साढ़े छ: तक वहाँ बैठ कर किसी के आ जाने की प्रतीक्षा करता रहा। फिर आखिरकार झुंझलाकर संजय की दुकान पर आ गया।
- चलो तुम्हारा एकांतवास ख़त्म तो हुआ भई। मैंने तो सोच लिया था कि इस जन्म में तो तुमसे मिलना अब होगा नहीं...
संजय उठकर गर्मजोशी
से गले मिला। अनुराग भी वहीं बैठा था। अब तक संजय से उसकी अच्छी खासी पटने लगी थी।
- दाढ़ी वाढ़ी क्यूं
बढ़ा रखी है यार?
अनुराग ने पूछा।
मेरे बोलने से पहले
ही संजय बोल पड़ा- जनाब आशिक़ हो गए हैं।
मैं हल्का सा
मुस्कुरा दिया।
- हम भी तो
जानें...कौन हैं मोहतरमा?
- आप जान जाएँगे। बस
एक बार मेरा लड़कियों के हॉस्टल में जाने का जुगाड़ करवा दीजिए।
इस बात को मजाक में
उड़ा देने के प्रयास में संजय मेरी खुली हुई हथेली पर अपनी हथेली मारकर जोर जोर से
हँसने लगा और अनुराग अवाक होकर मेरी ओर देखता रहा।
- अनुराग भाई, बस एक
बार। बहुत ज़रूरी है मेरे लिए।
- अरे लड़कियाँ कौनसा
जेल में कैद हैं यार? जिससे मिलना है, बाहर मिल लो।
अनुराग भी हँस दिया।
मैं चुप हो गया। उसके बाद मैं चुपचाप ही घर लौट आया। संजय कोई मज़ेदार किस्सा सुना
रहा था, जिसे मैं आधे में ही छोड़ आया।
मैंने ताला खोला तो दरवाज़े के अन्दर की तरफ़ एक गुलाबी रंग का कागज़ गिरा पड़ा था। मैंने उठाकर पढ़ा। इस बार नीली स्याही से लिखा था- आज नहीं। किस्मत में हुआ तो फिर कभी।
मैंने जेब से पहले
वाला कागज़ निकालकर देखा। वह कोरा सफेद कागज़ था। मैं दोनों की लिखावट मिलाने लगा। ‘र’ एक जैसा सा ही था, लेकिन ‘ज’ अलग अलग सा लगा। मैं सोचता रहा कि यह भी हो
सकता है कि दोनों संदेश अलग अलग हाथों ने लिखे हों। लेकिन किसने और क्यों?
सुधा कहाँ है?
सुधा घर से भाग गई थी। उसके घर में रोआपीटी मची रहती थी। आस पड़ोस की औरतें उसकी माँ को ढाढस बँधाने आतीं और मन्द मन्द मुस्कुराती हुई अपने घर लौटतीं। मोहल्ले में यह चर्चा थी कि सुधा पेट से थी। उसका भाई पहले की तरह ही चुप चुप रहता था। मुझे तो किसी ने यह भी कहा था कि सुधा के गायब होने में उसके भाई का भी हाथ है।
मेरे लिए सुधा के
भाई का अपना कोई नाम नहीं था, जैसे मेरी गाँव वाली चाची का किसी के लिए भी अपना
कोई नाम नहीं था। वे किसी दिन अँधेरे अँधेरे गाय के नीचे बाल्टी रखकर दुहने बैठ
रही होती और चाचा गलती से ‘भोरकली’, ‘भोरकली’ कहकर पुकारते
रहते तो वे मुड़कर भी नहीं देखती थी। उन्हें चलते चलते कुँए में गिर जाने वाला या
दौड़ते दौड़ते आसमान में उड़ जाने वाला सपना भी ओमपाल की घरवाली के नाम से दिखता था। चाची
के पंचायत के चुनाव का पर्चा भरने से पहले चाचा दो दिन तक उन्हें उनका नाम रटवाते
रहे थे।
अँधेरा ढलने के बाद
उसका भाई देर तक अपनी छत पर अकेला टहलता रहता था। मैं उसकी ओर देखता था तो मुझे
लगता था कि वह पलकें भी नहीं झपकता। मैं उससे नज़रें नहीं मिला पाता था। दोनों घरों की छतों के
बीच में एक पतली सी दीवार थी। कई बार अपनी शर्ट उतारकर घंटों तक वह उस दीवार पर उसे
झोली की तरह फैलाए बैठा रहता था जैसे किसी दिन टप से सुधा उसमें आ गिरेगी। मुझे डर
लगता था कि अगर वह मेरी छत की ओर गिरकर मर गया तो जैसे मैं उसका हत्यारा हो
जाऊँगा। मैंने एक दिन पुरानी काँच की बोतलें तोड़कर उस दीवार पर काँच बिखेर दिया
था। लेकिन फिर भी मुझे लगता था कि वह रोज रात को वहाँ आकर बैठ जाता है। मैंने अपनी
छत पर जाना छोड़ दिया था। वह गली में से गुजरता था तो मैं बाहर वाले कमरे की खिड़की
से झाँककर देखता था। मुझे लगता था कि अभी उसकी पैंट से कुछ काँच के टुकड़े निकलकर
नीचे गिरेंगे और वह लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर जाएगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ या
शायद किसी दिन मैं खिड़की से देखना भूल गया होऊँ और वह मेरे घर के सामने पड़ा देर तक
कराहता भी रहा हो। उन्हीं दिनों, जब मैं फिर से उसी उदास अचानक पागलपन में डूबने लगा था, जब अख़बार का फ़िल्म वाला पन्ना पढ़ते पढ़ते मैं अचानक रोने लगता था, जब सपने में मेरे पिता मर जाते थे और मैं आधी रात उठकर रोने लगता था, जब निठल्ले पड़े पड़े भी मुझे उन्नीस सौ चौरानवे खोई हुई फ़ुर्सत की तरह याद आता था, जब मेरा चींटियों के बिल में घुसकर उनकी दुनिया में रहने का मन करता था, जब मेरी कामवाली बाई के पीछे पीछे उसका दो साल का लड़का रोता रोता आ जाता था और मैं कामवाली को भगाकर देर तक आधे मैले छूटे फ़र्श पर औंधा लेटकर रोया करता था, जब मेरी स्कूल की एक दोस्त अपनी शादी का कार्ड देने अपनी सहेली के साथ मेरे घर आई थी और मैं उससे लड़ते लड़ते रोता रहा था, जब कोई भी दिन भरी पूरी दोपहर में छुट्टी लेकर ख़त्म हो जाता था और आधी रात में अचानक करारा सूरज चौंधियाने लगता था, उन्हीं दिनों में से एक दिन अचानक मेरे घर नीलम का फ़ोन आया। फ़ोन बिल्कुल हमेशा की तरह ही बजा जैसे उसे इस कॉल के असाधारण होने का पता ही नहीं चला हो। बेवकूफ़ फ़ोन!
फिर से मिनी की
साँसों वाली चुप्पी थी। मैं कुछ पूछता, बोलता, उससे पहले ही वह बोल पड़ी।
- मैं मिनी नहीं बोल
रही हूं।
- तुम कौन हो?
तुम्हारी साँसें मिनी की साँसों के चेहरे के क्लोजअप की तरह हैं।
वह सब कुछ जानती थी।
वह उत्तर पहले देती थी, मैं प्रश्न बाद में पूछता था। वह भगवान होने से इतनी ही
दूर लग रही थी जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर ‘भगवान
होना’ रखा हो और वह ट्रेन के उस
आख़िरी स्टेशन पर पहुँचकर थम जाने के बाद भी साइड लोअर बर्थ पर सोती रही हो।
उसने जवाब पहले दिया
– हाँ, मैं तुम्हें तुमसे ज़्यादा
जानती हूं।
मैंने बाद में पूछा – तुम मुझे जानती हो?
उसने जवाब पहले दिया
– हाँ, दोनों बार।
मैंने बाद में पूछा – उस दिन भी तुमने ही फ़ोन किया था?
उसने जवाब पहले दिया
– तुम सवाल बहुत पूछते हो।
मैंने बाद में पूछा – तुम नीलम हो ना?
उसने जवाब पहले दिया
– तुम्हारी ज़िन्दगी में बहुत
सारे गोल गोल कनफ्यूजन हैं, इसीलिए तुम पर प्यार आता है।
मैंने बाद में पूछा – गोलबाज़ार में भी तुम ही थी ना, जो नहीं आई
थी?
उसने पहले कहा – जबकि इतनी रोशनी है कि दो हज़ार मील दूर उड़ती
एक बया मेरी हथेली पर बैठी दिख रही है, मैं तुम्हें नहीं देख पाती।
मैंने बाद में कहा – जबकि इतना अँधेरा है कि दायाँ हाथ बाएँ से
टकरा जाने पर डर जाता है, तुम मेरी आँखों में तैर रही हो।
उसने कहा – सुधा कहाँ है?
मैंने कहा – सुधा कहाँ है?
बया ने कहा – सुधा कहाँ है?
नहीं, बया ने कुछ
नहीं कहा।
क्लीन दिल्ली,
ग्रीन दिल्ली
हॉस्टल में रह रहे
लोगों को देखकर लगता है कि उनका जन्म भी हॉस्टल में ही हुआ होगा, जब पास के किसी
कमरे में तेज आवाज़ में संगीत बज रहा होगा और उन्हें जन्म देने के तुरंत बाद उनकी
माँ लड़कियों के किसी झुंड में बैठकर किसी की आर्टीफिशियल बालियों के आर्टीफिशियल
होने को जानकर चौंक रही होगी।
लेकिन नहीं, सबका जन्म व्यवस्थित घरों में ही होता है। कुछ का अस्पतालों में भी। मगर मिनी का जन्म जब हुआ, तब ज़्यादातर लोग घर की किसी अँधेरी कोठरी में ही पहली साँस लेते थे।
मिनी जन्म से ही
अपने पिता से नफ़रत करती थी और अपनी माँ से बहुत प्यार। वह बाहर की दुनिया में आते
ही जोर से मुस्कुराई थी। नहीं, वह मुस्कुराना नहीं था, वह हँसना हो गया था। दाई के
थप्पड़ भी उसे रुला नहीं सके थे लेकिन सोलहवें मिनट में अपने बलिष्ठ पिता की गोद
में जाते ही वह चीखकर रो पड़ी थी। वह इतनी जोर से रोई थी कि पूरे शहर के लोगों को
लगा था कि कोई गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर पर रो रहा है। फिर वह तब तक रोती रही थी,
जब तक उसकी माँ के स्तन उसके होठों से छुआए नहीं गए।
बड़ी होने पर भी वह उदास होती थी तो माँ के गले लगकर उसकी उदासी कुछ कम हो जाती थी। सब बच्चों के साथ ऐसा ही होता था। जब वह दूसरी क्लास में थी तो चित्रकला की कॉपी में उसने पहले पन्ने पर अपनी माँ के वक्ष ही उकेरे थे और फिर गुरुजी ने सब बच्चों को अपने चित्र के नीचे उस चीज का नाम भी लिखने को कहा था। किसी ने झोंपड़ी लिख दिया था तो किसी ने फूल। मिनी की कॉपी देखकर गुरुजी ने कुछ क्षण सोचा था और फिर उससे पूछे बिना ही लाल पेन से फल लिख दिया था। गुरुजी बच्चे नहीं थे इसलिए गुरुजी ने अपनी सोच की सीमाएँ बना ली थीं। मिनी को गुस्सा आया था।
उसके पिता इतने सपाट
इंसान थे कि उनसे प्यार भले ही न किया जा सके, नफ़रत तो की ही नहीं जा सकती थी। वे
कभी ऊँचा नहीं बोलते थे, शराब पीकर घर नहीं लौटते थे, बीमारी में भी किसी से पानी
नहीं माँगते थे। वे कभी उत्साहित भी नहीं होते थे और निराश भी नहीं। कभी ऐसा भी
नहीं हुआ कि घर में किसी चीज की ज़रूरत हो और उन्हें एक बार भी कहना पड़ा हो। वे सब
कुछ बिना माँगे ले आते थे लेकिन सरप्राइज़ की तरह भी नहीं, बिल्कुल ऐसे जैसे रोज सुबह
सुबह दूधवाला आ जाता है।
लेकिन मिनी अपने
समतल पिता से इतनी नफ़रत करती थी कि एक बार उसने अपने पिता की चाय में कैमिस्ट्री
लैब से लाया हुआ सल्फ्यूरिक एसिड मिला दिया था। उसके पिता ने चाय पी ली थी और
उन्हें कुछ नहीं हुआ था। फिर ढाई साल बाद उसके पिता अचानक चल बसे थे। वे इतनी
सामान्यता के साथ मरे थे कि सबको लगा था कि वे मरे नहीं हैं, चलकर कहीं और जा बसे हैं।
बहुत दिन तक उनके दफ़्तर के लोग घर पर उनका नया पता पूछने आते रहे थे। एल आई सी
वालों ने उनकी लाश देखकर भी बीमे की रकम नहीं दी थी। जाँच अधिकारी ने अपनी टिप्पणी
में लिखा था कि बीमाधारक मरने का नाटक रचकर किसी और स्थान पर जा बसा है।
हमारे कस्बे में नए
नए खुले ‘ब्लू स्काई फ़ास्ट फ़ूड
कॉर्नर’ पर मैं नीलम से पहली बार
मिल पाया था। अनुराग ने मेरा संदेश उस तक पहुँचाया था और वह मिनी के साथ मुझसे
मिलने आई थी। उस छोटे से कमरे के सामने की दीवार पर दूर तक आसमान बिखरा हुआ था।
मैं जब घुसा तो वे दोनों आसमान में ही थीं। आसमान पर एक पोस्टर चिपका था, जिस पर
अंग्रेज़ी में लिखा था - Clean Delhi, Green Delhi । पोस्टर पर एक साफ सुथरा कूड़ादान बना था और उसकी बगल
में एक पेड़। अपने छोटे से कस्बे की उस दुकान पर मुझे उस पोस्टर को चिपकाने का
औचित्य समझ नहीं आया। मैं मन ही मन दोहराने लगा- क्लीन ग्रीन, क्लीन ग्रीन, क्लीन
ग्रीन...
नीलम ने कहा- आपकी
शर्ट पर ततैया बैठा है।
मैं डर गया। मेरे डरते ही ततैया उड़कर आसमान के पेड़ पर जा बैठा। उसके बाद मैंने नीलम के उस कथन को फिर से सुना। उसकी आवाज़ वाकई खनखनाती थी। शायद उसके पर्स में छोटा टेपरिकॉर्डर हो और वह जब भी बोलती हो, पर्स से ‘खनखन’ की आवाज़ आती हो।
मिनी ने कहा- आपने
पीली शर्ट पहन रखी है, इसलिए ततैया आपकी शर्ट पर बैठा था।
नीलम ने कहा- फिर आप
बसंत पंचमी पर क्या पहनेंगे? यह शर्ट आपको आज नहीं पहननी चाहिए थी।
मैंने कहा कि मेरे
पास ऐसी एक और शर्ट है। नहीं, ऐसी नहीं है, वह नारंगी है लेकिन मैं उसे पीली कहकर
पहन लेता हूँ।
मिनी ने पूछा कि
क्या उस पर भी फूल कढ़े हुए हैं? मैंने कहा, हाँ।
मैं क्लीन ग्रीन का
हिन्दी में अनुवाद करके तुकबंदी बनाने की कोशिश करने लगा। साफ
हराफ...नहीं...स्पष्ट हष्ट...नहीं नहीं, क्लीन माने स्पष्ट नहीं होता...स्वच्छित
हरित...नहीं।
मुझे लगा कि
अंग्रेज़ी बहुत समृद्ध भाषा है।
मैंने कहा कि यह
शर्ट भी धोकर फिर से पहनी जा सकती है। नीलम ने कहा कि यदि ज़्यादा मैली न हो तो
बिना धोए भी फिर से पहनी जा सकती है। मैं उसकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ।
एक लम्बे बालों वाले
लड़के ने मेन्यू लाकर रख दिया था। मैंने सोचा कि उसने हम तीनों को देखकर उन दोनों में
से किसी एक को मेरी गर्लफ्रेंड मान लिया होगा। मैं उससे पूछना चाहता था कि उसने
किसे माना है, लेकिन मैंने उससे पूछा कि पानी मिलेगा क्या? उसने नहीं कहा कि हाँ,
मिलेगा। वह चला गया। वह शायद पानी लाने ही गया हो। उसे जवाब देने की बजाय काम करने
की आदत पड़ चुकी थी। मैंने मिनी से पूछा कि बैंक में अगर कोई आकर पूछे कि ड्राफ्ट
बनेगा क्या, तो वह क्या करेगी? मिनी ने कहा कि वह कह देगी- हाँ, बनेगा।
मुझे लगा कि मिनी जब मुझसे कुछ कहती है तो मेरी ओर नहीं देखती। नीलम जब कुछ कहती है तो एक साथ हम दोनों की ओर देखती है। उन दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा था। मैंने चाहा कि काश ततैया उन पकड़े गए हाथों पर बैठ जाए और वे डरकर हाथ छोड़ दें। मैंने क्लीन ग्रीन की ओर देखा। ततैया वहाँ नहीं था। मुझे डर लगा और ख़ुद पर गुस्सा भी आया कि मैं उस पर नज़र भी नहीं रख पाया था। अब वह कहीं भी बैठा हो सकता था। मेरी शर्ट पर भी।
लड़का पानी रख गया
था। पानी को रखा नहीं जा सकता था, केवल बिखेरा जा सकता था, इसलिए वह पानी के गिलास
रखकर गया था। मैंने उन्हें मेन्यू देखकर कुछ मँगवाने के लिए कहा। मिनी ने लगभग
मेरी तरफ देखते हुए पूछा कि मेरा नाम क्या है? मैंने हँसकर कहा कि नीलम उसे मेरा
नाम बता देगी। नीलम ने कहा कि वह मेरा नाम नहीं जानती। मुझे बुरा लगा। मैं मन में
दोहराने लगा- क्लीन दिल्ली, ग्रीन दिल्ली।
मिनी ने कहा कि वे
दोनों चाउमिन खाएँगी। मैंने कहा कि नीलम, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। क्लीन
दिल्ली, ग्रीन दिल्ली। क्लीन दिल्ली, ग्रीन दिल्ली।
नीलम ने कहा कि सॉरी, अनुराग सर ने बताया था लेकिन हमें आपका नाम याद नहीं रहा। प्लीज़ बुरा मत मानिए।
मुझे लगा कि उसे मेरी बात सुनाई ही नहीं दी। मैंने फिर से कहा- नीलम, आई लव यू।
मिनी ने ऑर्डर देने
के लिए लड़के को आवाज़ लगाई। नीलम एक हाथ की उंगलियाँ अपने बालों में फिराने लगी।
मैं उठकर चल दिया। दरवाजे से बाहर निकलने से पहले मैंने मुड़कर देखा कि लम्बे बालों
वाला लड़का ऑर्डर लिख रहा था और वहाँ कुर्सी पर बैठे हुए मैं उसे एक फ़ैंटा लाने को
कह रहा था।
मैं पागल था।
शर्ट को उतारकर
फेंका गया तो उसकी सलवटें भी उसके साथ नीचे गिर गईं
पहले एक दफ़्तर था और
उससे लगता हुआ एक लम्बा गलियारा था, जिसके दोनों तरफ़ दस दस कमरे थे। उसके आखिरी
सिरे पर एक बड़ा कमरा था, जिसे टीवी रूम बना दिया गया था। वहाँ से बिल्कुल नब्बे
डिग्री का मोड़ लेकर एक और दस दस कमरों का गलियारा था। उसके आखिरी सिरे पर मैस था।
दफ़्तर में वॉर्डन कभी होती थी और कभी नहीं, लेकिन उसके दरवाजे पर एक चौकीदार हमेशा
बैठा रहता था। नहीं, दो चौकीदार थे, जो एक एक करके बैठते थे।
पहला चौकीदार जब दिन भर की
ड्यूटी के बाद घर जाता होगा तो वह घर में भी रात भर चौकीदार होने की मन:स्थिति में
ही रहता होगा। उसकी बेटी हिन्दी की किताब से जोर जोर से कविता पढ़ती होगी, “नर हो न निराश करो मन को...”, तो वह गुस्से में कहता होगा, “आवाज़ कम कर लीजिए मैडम।” उसकी पत्नी चाय लाती होगी तो चाय लेने के लिए खड़ा हो
जाता होगा। उसकी पत्नी मुड़ती होगी तो उसके बालों में लगे फूल को देखकर पूछता होगा
कि यह फूल कहाँ से तोड़ा? फिर घर के सारे गमलों के फूल गिनता होगा और टोपी लगाए हुए
ही चाय पीता होगा। उसने घर के दरवाजे पर एक शिकायत पेटी भी लगा रखी होगी, जिस पर
लाल अक्षरों में लिखा होगा- अपनी शिकायत लिखकर इस बॉक्स में डालें, और कोई सनकी
आदमी उसमें कुछ डालना चाहता होगा तो उसका दिल काँप जाता होगा। वह उसे बातों में
लगाने के लिए ‘जी साहब’, ‘जी साहब’ कहकर अपने फ़ौज
के दिनों का कोई किस्सा सुनाने लगता होगा। दोनों चौकीदार ड्यूटी बदलते वक़्त आपस
में मिलते होंगे तो ज़्यादा बात नहीं करते होंगे। दोनों चौकीदारों ने पक्का तय कर
रखा होगा कि अपनी बेटियों की शादी किसी से भी करेंगे, लेकिन किसी चौकीदार से नहीं।
चौकीदार चौकीदारी के पेशे से नफ़रत करते होंगे।
कमरा नम्बर सात को
छोड़कर सब कमरों पर ताला लगा हुआ था। लड़कियाँ ‘देस में निकला होगा चाँद’ देख रही थीं, जो ‘des mein nikla hoga chand’ था। कमरा नम्बर सात को बाहर से खटखटाकर पूछा
जाता तो अन्दर से मिनी बोलती कि वह सो रही है। ‘लाइट जलाकर?’ पूछे जाने पर वह कहती कि उसकी मर्जी। कोई पूछता कि नीलम कहाँ है तो वह
कहती कि मुझे सोने दो, मैं नहीं जानती। ऐसा बहुत बार होता था। नीलम एक दो घंटे के
लिए बिना किसी से कुछ कहे गायब हो जाती थी।
मिनी सो नहीं रही थी। थोड़ी सी भी रोशनी में मिनी का सो पाना उसके लिए इंग्लिश चैनल तैरकर पार करने जितनी बड़ी महाभारत थी। फिर भी महीनों से पूरे हॉस्टल के लिए वह लाइट जलाकर सोने वाली मिनी थी।
यदि उस समय कोई
ततैया नीलम के पहने हुए कपड़ों पर बैठने का सपना पालकर उस कमरे में घुसता तो उसे
हताश होकर शराब पीकर ही अपने घर लौटना पड़ता। नीलम निर्वस्त्र थी। उसके पूरे शरीर
पर कुल तीन तिल थे। एक दायीं हथेली पर, एक दाएँ कान के नीचे और एक तिल को उसकी गोद
में लेटी मिनी ने ढक लिया था। मिनी ने तीसरा तिल चूम लिया। नीलम ने कहा कि वह
चाहती है कि मिनी उस तिल को देर तक चूमे। नीलम ने इस तरह कहा जैसे अब तक हमेशा वही
होता आया है, जो वह चाहती है।
मिनी ने कहा कि वह
उसके साथ कहीं पहाड़ों पर जाकर रहना चाहती है, जहाँ कड़ाके की सर्दी पड़ती हो। नीलम
ने कहा कि वह बोलते हुए भी चूमती रहे। मिनी ने कहा कि बोलते हुए चूमना, चुम्बन का
अपमान होगा। नीलम ने आगे झुककर उसके होठों पर अपने होठ रख दिए। उनकी साँसें एक
दूसरी की साँसों के साथ गुत्थमगुत्था हो गईं, ऐसे कि नीलम उस वक़्त किसी को फ़ोन
करती तो सुनने वाले को लगता कि मिनी का फ़ोन है या फिर फ़ोन नीलम का है और साँसें
मिनी की।
उस कमरे में इतना
सामान था कि कमरा भी एक बड़ा सा सामान लगता था। ऐसा लगता था कि कमरा भी किसी बड़े
गत्ते के डिब्बे में बंद करके लाया गया होगा, जिस पर लिखा होगा- Handle
with Care। डिब्बे के अन्दर कमरे के
कोनों पर बाहर की तरफ़ थर्मोकोल के टुकड़े रखे होंगे। कमरा लाने के लिए ट्रक लाया
गया होगा। ट्रक के पीछे होरन ओके प्लीज लिखा होगा। कमरे को ट्रक में लादने के बाद
ड्राइवर ने जल्दी में चाय ख़त्म करके ट्रक स्टार्ट किया होगा। ड्राइवर ने तब अपने
काम को गाली दी होगी। ड्राइवर ड्राइविंग के पेशे से नफ़रत करता होगा।
होठ हटे तो मिनी ने
कहा कि वह चाहती है कि वह अभी एक सुई कहीं नीचे गिरा दे और नीलम पूरे कमरे में उसे
खोजे। घुटनों के बल, कुहनियों के बल, छाती के बल, ठुड्डी के बल, बालों के बल। नीलम
ने कहा कि वह बिना खोई हुई सुई को मिनी के लिए ढूंढ़ना चाहती है।
नीलम ने सूटकेस के
नीचे घुटनों के बल ढूंढ़ा, अलमारी के अन्दर कुहनियों के बल, रोशनदान में ठुड्डी के
बल, छत में बालों के बल और मिनी की शर्ट की जेब में छाती के बल। शर्ट की जेब में
सुई नहीं मिली, इसलिए शर्ट को और टटोलकर देखना पड़ा। शर्ट पर ‘हैंडल विद केयर’ नहीं लिखा था, इसलिए उसे मुट्ठी में भींचा जा सकता था,
मसला जा सकता था। शर्ट पर लिखा था कि उस पर इस्तरी की जा सकती है। हॉस्टल के
दरवाजे के सामने बैठने वाला धोबी एक कपड़े पर लोहा करने के पचास पैसे लेता था। वह
यह भी नहीं पूछता था कि शर्ट में इतनी सलवटें कैसे पड़ीं? सुबह आठ बजे तक शर्ट उसे
दी जाती तो वह दस बजे तक लौटा देता। उसे कोई फ़ोन भी नहीं करता था इसलिए ऐसा होने का
भी डर नहीं था कि दस बजे उसके पास जाकर खड़े हुए और वह साढ़े दस तक हाथ के इशारे से
एक एक मिनट माँगकर फ़ोन पर बतियाता रहे। धोबी के लिए सब कपड़े बराबर होंगे। धोबी के
लिए लड़कियाँ, लड़कियाँ भी नहीं होंगी। उसके लिए कोई कपड़ा लड़की का कपड़ा भी नहीं होगा
कि हाथ लगाए और झुरझुरी होने लगे। उसके लिए शर्ट का हर हिस्सा समान महत्व रखता
होगा। ऊपर, बीच और नीचे, तीनों एक से। उसके मन और हाथों को सब उभारों को समतल कर
देने की चाह की आदत पड़ चुकी होगी। उसे सलवटों, उभारों और प्रेम से चिढ़ होती होगी।
धोबी अपने पेशे से निश्चित तौर पर नफ़रत करता होगा।
शर्ट को उतारकर
फेंका गया तो उसकी सलवटें भी उसके साथ नीचे गिर गईं, लेकिन लगा यही कि सिर्फ़ शर्ट
नीचे गिरी है। किसी और से पूछा जाता तो वह भी यही बताता कि नीचे जूतों के पास शर्ट
गिरी पड़ी है। धोबी से पूछा जाता तो वह कहता कि सलवटें गिरी पड़ी हैं। फिर सब धोबी
पर हँसते।
बंडल कहानी
वात्स्यायन ने
कामसूत्र में लिखा है कि संसार की कोई भी स्त्री, चाहे वह कितनी भी कठोर क्यों न
हो, घुटनों पर झुके पुरुष के प्रणय निवेदन को नहीं ठुकरा सकती।
हम दोनों एक ही बस
में बैठे थे। ‘हम दोनों’ माने मैं और नीलम। वह शायद ‘मैं एक बस में बैठी थी’ थी। मैं ‘हम दोनों एक ही बस में बैठे थे’ था। वह मुझसे बिल्कुल अगली सीट पर थी। दो सीटों के बीच में इतनी जगह नहीं
थी कि कोई घुटनों पर झुक सके। यदि मैं घुटनों पर झुकता तो अपनी सीट पर घुटने रखता
और ऐसे में मेरा सिर बाकी यात्रियों से कुछ ज़्यादा ऊँचा हो जाता। सब तमाशे की तरह
के कौतूहल से मुझे देखते। सबको लगता कि अब मैं कुछ करूंगा। मेरी बगल की सीट पर
बैठा बच्चा यह सोचता कि मैं ऊपर रखे अपने सामान को उतार रहा हूं और ऊपर रखे किसी
और के थैले की ओर देखने लगता। उस थैले पर लिखा था- 502 पताका बीड़ी, और उसके नीचे बस पर लिखा था- सवारी अपने
सामान की खुद जिम्मेदार है। वह सोचता कि उतारते हुए थैला गिर भी सकता है। फिर वह
सोचता कि लिखा है- चश्मे वाला लड़का अपनी 502 पताका बीड़ी का ख़ुद ज़िम्मेदार है। लेकिन वह थैले की ओर
देखते देखते थक जाता और थैला नहीं उतरता। उसे अपेक्षाओं के डूब जाने वाला दुख
होता। वह सोचता कि वह थोड़ा और छोटा होता तो इस बात पर ठुनक ठुनक कर रोया जा सकता
था। मैं उसके कान में कहता कि वह सोचे- चश्मे वाला लड़का अगली सीट पर बैठी सुन्दर
लड़की का ख़ुद ज़िम्मेदार है। तब सुन्दर नीलम हिकारत से मुझे देखती और सोचती, “हे भगवान! ये पजेसिव लड़के!”
मैं घुटनों पर नहीं
झुका। कुछ देर बाद उसके पास की सीट खाली हो गई। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। मेरे
पैर उसके पैरों को छूकर गुजरे। उसने मुझे पहचान लिया था। वह कुछ बोली नहीं, लेकिन मुस्कुराई।
मैं खिड़की की ओर था। उसकी तरफ से देखने पर लगता होगा कि मैं खिड़की वाली हरी पीली
सीनरी के केन्द्र में हूं। मैंने एक हाथ इस तरह पीछे कर लिया कि तस्वीर में आधा
टूटा हुआ काँच और उस पर चिपका हुआ बवेजा दवाखाने का विज्ञापन न दिखाई दे। मैं
चित्रों और मूर्तियों की सुन्दरता को लेकर कुछ ज़्यादा ही सतर्क रहता था। क्या पता
कि उसका मन किया हो कि सीनरी पर नीचे अंग्रेज़ी में ज़िन्दगी के बारे में कुछ
आशावादी कथन लिखकर हॉस्टल के अपने कमरे में टाँग लिया जाए। नीलम इतनी सुन्दर थी कि
मुझे लगा, मेरी तस्वीर उसके कमरे में नहीं जँचेगी। मैं कुछ सेकंड के लिए नीचे झुक
गया। मेरी इस हरकत पर वह चौंककर मुझे देखने लगी। मैं उठकर बैठ गया। वह फिर
मुस्कुरा दी।
मैंने पूछा- तुम्हें
तो सपने भी बहुत सुन्दर आते होंगे? ताजमहल के, पहाड़, झरनों, जंगल और अंतर्देशीय
पत्रों के...
- क्योंकि मैं इतनी
सुन्दर हूं, इसलिए?
वह बाकी सुन्दर
चीजों से अलग थी। ताजमहल नहीं जानता कि वह सुन्दर है। वह जानती थी कि वह सुन्दर
थी। शायद
इसीलिए वह बात की शुरुआत न करती हो। कोई उसके पास की सीट पर बैठता हो तो उसे पता
रहता हो कि वह उससे ख़ुद बात करना शुरु करेगा। कुछ लोग तो वहीं का टिकिट लेते
होंगे, जहाँ का वह लेती होगी। स्कूल में छमाही परीक्षा में उसे और लड़कियों से दो
तीन नम्बर ज़्यादा मिलते होंगे। लड़कों से तो कई नम्बर ज़्यादा, शायद दस बीस भी।
ताजमहल के पास तो कोई
बैठता होगा तो कभी-कभी ताजमहल स्वयं भी बात शुरु कर देता होगा। छमाही परीक्षा में
नकल करते हुए पकड़े जाने पर उसे अनदेखा नहीं किया जाता होगा, उसकी कॉपी छीन ली जाती
होगी। अपने आप से याद करके लिखा हुआ उत्तर भी काट दिया जाता होगा।
मैंने कहा, “हाँ, इसलिए। हाँ, इसीलिए।” फिर उसने कहा कि सब जंगल सुन्दर नहीं होते।
मैंने कहा कि मैंने कभी जंगल नहीं देखे। उसने बताया कि जंगल वैसे नहीं होते, जैसे
कॉमिक्स में बने होते हैं। उसने कहा कि इसीलिए जंगलों को देखकर उनके जंगल होने का
पता नहीं चलता। हम उन्हें दो गाँवों के बीच खड़े पेड़ समझते रहते हैं। कोई हमसे
पूछता है तो हम कहते हैं कि ये पाँच हज़ार पेड़ हैं क्योंकि उनकी अलग अलग गिनती हुई
है और उन पर नम्बर लगाकर सफेदी भी पोत दी गई है। हम कभी यह नहीं कहते कि यह एक जंगल
है, जिसका नाम चम्पकवन या सुन्दरवन है। उसकी इस बात से भी मैं बहुत प्रभावित हुआ।
लेकिन साथ ही मैंने कहा कि हो सकता है, कुछ लोग जंगल को पहचानते भी हों। उसने कहा,
“हाँ”।
मैंने उससे कहा कि
फ़ोन पर उसकी आवाज़ और भी मीठी लगती है। वह कुछ रुककर मुस्कुराई जैसे भूलकर
मुस्कुराई हो। फिर मेरी एक बात उसे बहुत अच्छी लगी, जो मुझे बाद में याद नहीं रही।
वह बात उसे इतनी अच्छी लगी कि अगले महीने हम दोनों ने शादी कर ली।
संजय कहता है कि शादी
भले ही अचानक कर ली जाए लेकिन बड़ी बातों को इस तरह अचानक नहीं कह देना चाहिए। पहले
भूमिका बाँधनी चाहिए और पूरी भूमिका के दौरान सुनने वाले को अंत से विपरीत दिशा
में ले जाने का प्रयास करना चाहिए। फिर एकदम से भेद खोलना चाहिए। वह कहता है कि
किसी भी कहानी का असली मज़ा चौंकने और चौंकाने में है और अगर कोई कहानी चौंकाती
नहीं है तो वह बंडल है।
मिनी शादी में नहीं
आई। नीलम ने कहा कि उसे बैंक के काम से जयपुर जाना पड़ रहा है। मैंने सच मान लिया।
एक ब्लैंक फ़ोन कॉल कुछ दिन तक हमें परेशान करती रही। हर फ़ोन कॉल की साँसों का अपना
अलग रंग होता है, अपनी अलग अलग गुत्थमगुत्थियाँ। ऐसा भी होता था कि नीलम मेरी गोद
में बैठी संतरा छील रही होती थी और फ़ोन उठाने पर लगता था कि उधर भी वही है। फिर मैं नीलम को आँख भर
के देखता था तो वह मुस्कुरा देती थी। उसके मुस्कुराने में दूध का उबाल था। उसे पा
लेना इतनी बड़ी बात थी कि उसके लिए हज़ारों कहानियों को बंडल बनाया जा सकता था।
‘हम दोनों’ माने मैं और सुधा
सुधा मुझसे छ: सात
साल छोटी थी। उसे गिलहरियों और चींटियों की कहानियाँ बहुत पसन्द थी। अब गिलहरियाँ
और चींटियाँ महाभारत या रामायण की नायिकाएँ तो हैं नहीं कि उन पर अलग अलग
दृष्टिकोण से ढेरों कहानियाँ लिख दी गई हों। तो इसलिए वह मेरे पास आकर उनकी कहानियाँ
सुनने की ज़िद करने लगती थी। ज़िद करना फिर भी बहुत शालीन है, वह तो आसमान सिर पर
उठाने जैसा कुछ करती थी। मुझे भी सुबह सुबह उसके सिर पर उठा हुआ उनींदा आसमान बहुत
भला लगता था। मैं जितनी कहानियाँ जानता था, उन सबके पात्रों को गिलहरियों या
चींटियों में तब्दील करके उसे सुनाता रहता था। उसे मेरी सुनाई हुई एक एक कहानी याद
थी। हम दोनों के साहित्य का एक बड़ा हिस्सा गिलहरी साहित्य और चींटी साहित्य के रूप
में था। ‘हम दोनों’ माने मैं और सुधा। वह भी ‘हम दोनों के साहित्य का एक बड़ा हिस्सा गिलहरी
साहित्य और चींटी साहित्य के रूप में था’ थी और मैं भी ‘हम दोनों
के साहित्य का एक बड़ा हिस्सा गिलहरी साहित्य और चींटी साहित्य के रूप में था’ था। तब सुधा नौ दस साल की थी। उसका जन्मदिन चौदह
अक्टूबर को आता था और दसवीं की फेल वाली मार्कशीट में एक जुलाई को। उन दिनों सब
अख़बारों में भविष्यफल सूर्यराशियों के आधार पर आने लगा था। चौदह अक्टूबर वाले
जन्मदिन की तरह चन्द्रराशियाँ बिना कारण के छिपाई जाने लगी थीं। एक जुलाई वाली
सुधा की सूर्यराशि कर्क थी। उसमें झूठी कर्क राशि की सच्ची निरंतर बेचैनी भी आ गई
थी। शायद मार्कशीट से निकलकर आई हो।
सुधा भी सबकी तरह
बड़ी हो गई, लेकिन उसकी चंचलता कहीं नहीं गई। उसके घरवालों ने उसे कभी रोका टोका
नहीं कि यहाँ मत जाओ, वो मत करो, ये मत पहनो, वो पहनो। लेकिन मैं उसे टोकता रहता था।
उसने स्कूल जाना भी छोड़ दिया था और अंग्रेज़ी का ट्यूशन पढ़ने लगी थी। सुधा के बाल
लम्बे थे। मेरा उन बालों से अपना चेहरा ढक लेने का मन करता था। एक दिन सुधा वे बाल
भी कटवा आई। उस दिन मैं उससे बहुत लड़ा। वह भी घर जाकर बहुत रोई। उस रात मैंने दो
बजे तक टीवी देखा। उन्हीं दिनों में मुझे यह आदत पड़ी थी। जब भी गुस्सा आता या उदास
होता तो टीवी के सामने बैठ जाता था। संजय शराब से जो काम करता था, मैं उसे टीवी से
करता था। टीवी वाले लोग बहुत हँसते थे। धारावहिकों में बैकग्राउंड के रंग कुछ
ज़्यादा ही उजले होते थे। उन्हें देखकर रोने को स्थगित करने में अक्सर कामयाबी मिल
ही जाती थी।
इसी बीच एक दोपहर वह
मेरे घर आ गई। घर में और कोई नहीं था। मैं भी घर में था या टीवी में था, यह अंतर
कर पाना मुश्किल काम था। मैं लेटा था। लेट कर टीवी देखने से मेरी आँखें दुखने लगती
थी। मैं उन्हें दुखने देता था। ऐसा करने पर ऐसा लगता था, जैसे किसी पर अपना गुस्सा
उतार दिया हो। वह अपना गुस्सा उतारने के लिए पुरानी किताबें फाड़ फाड़कर फेंका करती थी। मेरी माँ अपना
गुस्सा उतारने के लिए ज़्यादा रोटियाँ बनाती थी और गर्मियों के दिनों में चूल्हे के
सामने सिकती रहती थी। मेरा अख़बार वाला अपना गुस्सा उतारने के लिए हर अख़बार पर नीचे
कोने में कोई गाली लिख देता था। बचपन में जिस प्राइवेट स्कूल में मैं पढ़ा था,
उसमें हज़ार रुपल्ली पर आठ घंटे पढ़ाने वाले एक सर अपना गुस्सा उतारने के लिए हमारी
कनौती के बालों से पकड़कर हमें हवा में उठा देते थे। मेरी दीदी अपना गुस्सा उतारने
के लिए अपने बेटे को बहुत मारती थी। उनका बेटा अपना गुस्सा उतारने के लिए रोया
करता था। साथ में दीदी भी।
वह आसमानी रंग की
स्कर्ट में थी। मुझे लगा कि वह अपने घर से मेरे घर तक गायब होकर आई होगी, नहीं तो
तब तक मेरे मोहल्ले में और हल्ला मच गया होता। और हल्ला इसलिए क्योंकि हल्ला तो
पहले से ही था। कोने वाली त्यागन अपने सामने वाली पहाड़न से लड़ रही थी। बात यह थी
कि पहाड़न ने पिछली दोपहर अपने घर आए त्यागी जी को चाय पिला दी थी और घर में और कोई
नहीं था। घर कम थे, आदमी ज़्यादा लेकिन फिर भी अक्सर घरों में कोई नहीं होता था।
नहर के पास वाला मैदान भी खाली पड़ा रहता था। दोपहर में कस्बे के सब दुकानदार ऊँघते
ऊँघते ग्राहकों की बाट जोहते रहते थे। कई रूटों की बसें यात्रियों की कमी की वज़ह
से बन्द हो गई थी इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता था कि लोग सफ़र में रहते हैं। दफ्तरों
में जाओ तो कुर्सियाँ खाली पड़ी रहती थीं और हर काम बाद के लिए छूटा हुआ रहता था। मुझे
कभी समझ नहीं आया कि आख़िर सब लोग होते कहाँ थे! इतवार की दुपहरी में भी!
उसने स्कर्ट के ऊपर
अपने भाई की चेक वाली शर्ट पहन रखी थी। उसकी स्कर्ट में दायीं तरफ़ एक जेब बनी हुई
थी। जेब में चार इलायची थीं। वह बन्द दरवाजे का सहारा लेकर उस पर झुकी हुई खड़ी थी।
जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, उसकी जेब से दो इलायचियाँ निकलकर नीचे गिर पड़ीं। उसने
नीचे झुककर उन्हें उठा लिया। उसकी शर्ट के सब बटन बन्द थे। नीचे बैठे बैठे ही उसने
मुझसे बाकी दोनों इलायचियाँ उसकी जेब से निकालकर खा लेने के लिए कहा। मैंने उसके
हाथ वाली दोनों इलायची ले लीं और घर के भीतर की ओर चल दिया। वह मेरे पीछे पीछे
बरामदे में आकर खड़ी हो गई। वह फ़िल्मों के सीन की तरह ऐसे खड़ी थी कि सामने टँगे
छोटे से आईने में मुझे दिख रही थी। उसकी आँखों में राजस्थान था, प्यासा और उदासा। उसकी
शर्ट के ऊपर के दो बटन मुझे दिख रहे थे, जो खुले थे। उनके पीछे गिलहरियों और
चींटियों की कहानियाँ सुनने वाली सुधा नहीं थी। उनके पीछे लाइब्रेरी में छिपाकर
रखी गई एक परीकथा थी, जिसे पढ़ने के लिए बिगड़ जाने का मन करता था।
मैं दो बातों के लिए
ज़िन्दगी भर पछताया। एक, उस दोपहर जंगली होकर उसे प्यार नहीं करने के लिए।
दूसरी वज़ह भी यही थी।
वह रोती रोती गई।
वह जाते जाते रोई।
बाद में एक दिन वह
रिनॉल्ड्स के दो बॉलपेन खरीदकर लाई, एक नीला और एक काला। उसका ट्यूशन बन्द हो गया
था। अब वह हिन्दी को हिन्दी में ही लिखती थी। काले पेन से सफेद कागज़ पर लिखती थी- छ:
बजे गोलबाजार में मिलो। नीले पेन से गुलाबी कागज़ पर लिखती थी- आज नहीं।
किस्मत में हुआ तो फिर कभी। अजीब लड़की थी, दोनों बातें एक साथ लिखकर रख लेती
थी और पहली बात मेरे दरवाजे के नीचे से सरका देती थी। फिर अपनी छत पर बैठकर मुझे
बेचैन होते हुए देखती थी, मुझे हड़बड़ी में तैयार होकर गोलबाज़ार की ओर भागते हुए
देखती थी, थके कदमों से मुझे लौटते हुए देखती थी, लौटकर दूसरी बात पढ़ते हुए देखती
थी, जूते उतारकर बिना हाथ धोए घड़े से पानी पीते हुए देखती थी, नीलम का नाम ले लेकर
रोते हुए देखती थी और नाखून चबाते चबाते अचानक अपनी उंगली काट लेती थी।
यह सब बाद में हुआ।
पहले एक दिन उसने मुझसे कहा कि मैं उसे फ़िल्म दिखाने ले चलूं। ऐसा कहते हुए वह ऊपर
से नीचे तक शर्म से भीग गई थी। ऐसा सुनते हुए मैंने उसका भीगकर बर्फ़ हो जाना देखा।
बर्फ़ मुलायम थी, जिस पर उंगलियों से अपना नाम लिख देने का मन करता था। मैं उसे
अँगूठा चूसने के दिनों से जानता था। सिनेमाहॉल के अँधेरे में मैंने दूसरी सुधा
देखी। उसके बाल फिर लम्बे हो रहे थे। उसने उन्हें खोलकर मेरे चेहरे पर रख दिया।
हमने छूने का एक खेल खेला, शायद लूडो, छूने की लूडो। उसने मुझसे पूछा कि मुझे
कौनसे रंग की टिक्कियाँ पसन्द हैं? मैंने पूछा, “कौनसी टिक्कियाँ?” उसने कहा कि लूडो खेलने वाली। मैंने लाल रंग चुना। हम
कभी किले तक नहीं पहुँचे। पहुँचने वाले होते तो जानबूझकर हार जाते थे और फिर से
शुरु करते थे। हमने जी भर के एक दूसरे को छुआ और हारते रहे। लौटते हुए वह बहुत खुश
थी, लेकिन मुझे एक ग्लानि सी होती रही। मुझे लगा कि जैसे मैंने अपनी गिलहरी जैसी
प्यारी सुधा को मैला कर दिया है। सुधा ने कहा कि वह मैली होना चाहती है। मैंने उसे
जोर से डाँट दिया। वह रोती रोती गई। वह जाते जाते रोई। मुझे न जाने कौनसी बीमारी
हो गई थी कि मैं बार बार साबुन से रगड़ रगड़कर हाथ धोता रहता था।
सुधा के भाई ने नई
मोटरसाइकिल खरीदी थी। लाल रंग की स्प्लेंडर। वह उस पर बैठकर अपने ननिहाल जाता था
और खुश खुश लौटता था। मैं जहाँ भी गया, जहाँ से भी लौटा, इतना खुश कभी नहीं लौटा।
कभी कभी सुधा भी उसके साथ जाती थी। वह एक तरफ पैर लटकाकर बैठती थी। वह दोनों तरफ
पैर करके बैठती तो लोग बात बनाते, इसलिए वह एक तरफ पैर रखती थी। उसका दायाँ पैर
उदास रहता था। उनकी मोटरसाइकिल पर लिखा नहीं होता था कि डबली जा रहे हैं, लेकिन
मुझे मालूम रहता था।
डबली नाम के दो गाँव
थे, डबली राठान और डबली कलाँ। ऐसा लगता था कि एक नाम के दो व्यक्ति हों और गोत्र
अलग अलग हो। अपने गोत्र में विवाह वर्जित थे इसलिए डबली राठान का भालगढ़ राठान से
विवाह नहीं हो सकता होगा चाहे दोनों कितना भी प्रेम करते रहे हों। समान गोत्र के
कारण डबली बहन होगी और भालगढ़ भाई। गाँवों के नाम में कलाँ बहुत कॉमन था। कलाँ
गोत्र के गाँव प्यार करते हुए बहुत सतर्कता बरतते होंगे। स्त्री गाँव आरम्भ में ही
पुरुष गाँव से उसका, उसकी माँ का, उसकी दादी का, उसकी नानी का गोत्र पूछ लेती
होगी। पुरुष गाँव शुरुआत से ही रूमानी होना चाहता होगा। स्त्री गाँव दुनियादारी की
बातें पहले तय कर लेती होगी। कई बार इस कारण पुरुष गाँव का मन भी उचट जाता होगा।
वह स्त्री गाँव को छोड़कर कविताएँ लिखने लगता होगा। कई जिलों तक स्त्री गाँव बुरी
कहाई जाती होगी।
उन दोनों के दो मामा
थे, जो डबली राठान में रहते थे। डबली राठान एक बड़ा गाँव था। उनके नाना का छोटा
परिवार था और बड़ा घर था। घर के मुख्य दरवाजे पर लगे पत्थर पर ‘ओम’ के नीचे ‘1980-उन्नीस
सौ अस्सी’ लिखा था। उसे देखकर
उन्नीस सौ अस्सी का एक चित्र मन में उभरता था। उस पत्थर को छूने का मन करता था।
ऐसा लगता था कि इस पत्थर को छूने से उन्नीस सौ अस्सी में जाया जा सकता है। उसे देर
तक देखो तो दीवार में वह पत्थर चुन रहे एक आदमी का श्वेत-श्याम चित्र भी दिखता था।
हालांकि उन्नीस सौ अस्सी में रंगीन चित्र खिंचने लगे थे लेकिन कल्पना करो तो चित्र
काला और सफेद ही दिखता था।
उनके दोनों मामा दो
दो बेटियों और एक एक बेटे के पिता थे। बड़े मामा की छोटी बेटी का नाम रवीना था। कहने
को तो वह नीलम के कॉलेज में पढ़ती थी और उसी के हॉस्टल में रहती थी लेकिन हॉस्टल
में रहने वाली लड़कियों के बारे में सुधा की मामी के ख़याल कुछ ज़्यादा नेक नहीं थे,
इसलिए साल में आठ महीने वह गाँव में ही रहती थी। सुधा अकेले में रवीना को भाभी
कहती थी। वह शरमा जाती थी। उसका छोटा भाई सात साल का था। एक दिन उसने सुधा का
रवीना को भाभी कहना सुन लिया। वह रोने लगा। दोनों लड़कियों ने उसे बहुत मुश्किल से
चुप करवाया। फिर उन्होंने उसे समझाया कि वह भाभी नहीं, बॉबी कह रही थी। बच्चे को
बताना पड़ा कि सुधा रवीना को प्यार से बॉबी कहती है क्योंकि इसी नाम की एक फ़िल्म
में रवीना टंडन ने बॉबी का किरदार निभाया था। उस दिन के बाद वह भी उसे बॉबी दीदी
कहने लगा। उस लड़के का इतिहास बोध और सामान्य ज्ञान जीवन भर गड़बड़ाया रहा।
गाँव में एक टूटा
हुआ घर था। घर तो क्या था, सिर्फ़ दरवाजा बचा था। दूर तक कुछ नहीं, सिर्फ़ एक छोटी
सी टूटी फूटी दीवार और उसमें दरवाजा। गाँव वाले उसे लागी बाबा की चौखट कहकर पूजते
थे। चौखट के उस तरफ जाना मना था। हालांकि उस तरफ भी मैदान ही था लेकिन उधर जाना
पाप माना जाता था। ऐसा नहीं कि चौखट ने पूरी दुनिया दो भागों में बाँट दी थी और
डबली राठान के लोग दूसरे गोलार्द्ध में जाते ही नहीं थे। बस चौखट के उस पार जहाँ
तक पहले कभी घर के होने का अनुमान होता हो, वहाँ जाना वर्जित था। घर का आकार सबके
लिए अलग अलग था इसलिए सबने उस काल्पनिक घर की सीमाएँ अपनी अपनी सोच के अनुसार तय
कर रखी थीं। नेमीचन्द कुम्हार एक झोंपड़ी जितनी जगह ही छोड़ता था और रामस्वरूप
गोदारा उसके पार दस बारह बीघा तक कदम नहीं रखते थे। मान्यता थी कि लागी बाबा वहाँ
आराम करते हैं। शायद चाय भी पीते हों, ताश खेलते हों, अख़बार भी पढ़ते हों। बारिश
होती हो तो भीग जाते हों। यह मान्यता नहीं रखी गई थी कि बारिश के दिनों में चौखट
के पार छतरी फेंक दी जाए। ताश भी अकेले खेलना मुश्किल होता होगा।
चौखट के इस पार
अगरबत्तियाँ, सरसों के फूल और बिन्दियाँ रखी रहती थीं। वहाँ कुँवारी लड़कियाँ ब्याह
की मन्नत माँगने आती थी और विवाहित स्त्रियाँ सुहाग सलामती की मन्नत माँगने। विवाह
का होना और फिर हुए रहना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। स्त्रियाँ बेचारी थीं।
रवीना और सुधा और
सुधा का भाई और रवीना का भाई, सब शाम को चौखट पर घूमने जाते थे। रवीना के भाई का
नाम रवि था। घर के बाकी भाई बहन घर में रहते थे। रवीना की बड़ी बहन शादी के बाद अपनी
ससुराल में रहती थी। सुधा का भाई उन तीनों को बिठाकर कहानी सुनाता था। तब सुधा को मेरी बहुत
याद आती थी। वह कहती कि वह एक चप्पल घर में ही भूल आई है और उसे लेने जा रही है।
सब देखते कि उसने दोनों पैरों में चप्पलें पहन रखी हैं लेकिन कुछ न कहते। सुधा
अँधेरिया मोड़ पर मुड़कर दीवार की टेक लगाकर मुझे याद करती रहती। अँधेरिया मोड़ पर
खड़ा आदमी किसी तरफ से नहीं दिखता था। उसे मुड़ते हुए तीस चालीस सेकंड के लिए ही
देखा जा सकता था। लड़की खड़ी होती तो मुड़ना डेढ़ दो मिनट तक खिंच जाता था। चौखट पर
सुधा का भाई रवीना और रवि को कहानी सुनाता रहता था। उसकी कहानियों के पात्रों में
कभी आपस में कोई रिश्ता नहीं होता था। उसकी कहानी कभी ऐसी नहीं होती थी कि राम और
श्याम नाम के दो भाई थे या एक गरीब किसान था, जिसके बेटे का नाम घुच्ची था या एक
राजा की चार रानियाँ थीं। कभी कभी बीसियों पात्र हो जाते थे और किसी में आपस में
कोई रिश्ता नहीं। इस कारण अक्सर कहानियाँ बहुत उलझ जाती थीं। अंत में सब पात्र एक
साथ किसी मंजिल पर भी नहीं पहुँच पाते थे। रवि अक्सर उकताकर खेलने निकल जाता था।
अँधेरा होने लगता था। सुधा का भाई रवीना के साथ देर तक चौखट पर बैठा रहता था। लागी
बाबा के दिन ढलने से पहले सो जाने की मान्यता थी। सुधा चप्पल लेकर आखिर में लौटती
थी। भूल जाना रोज होता था।
रात भर जागना अपराध
की तरह माना जाता था। सुधा की बड़ी मामी का बस चलता तो रात भर जागने के जुर्म में
काले पानी की सजा का प्रावधान करवा देती। घर के सब लोग रात भर चैन से सोए रहें, यह
ज़िम्मेदारी रवीना की थी। प्रत्यक्ष रूप से तो ज़िम्मेदारी केवल सबको सोने से पहले
गर्म दूध का गिलास देने की थी लेकिन रवीना ने इस उत्तरदायित्व में चैन से सुलाना
अर्थात दूध में नींद की गोलियाँ मिलाना भी जोड़ लिया था। एल्प्रेक्स की एक गोली
खाकर आठ घंटे से पहले आँख नहीं खुल सकती थी। सुधा का भाई सबके साथ दूध नहीं पीता
था। रवीना को दूध देखकर ही उबकाई आती थी। सुधा रोज दूध पीती थी ताकि उसे दो बातों
के लिए ज़िन्दगी भर पछताने वाले लड़के के सपने न आएँ। बेहोश होना सपने न आना नहीं
था, लेकिन ऐसा लगता था।
सुधा के लिए
चींटीपुर नाम का एक
छोटा सा कस्बाई बिल था। हालांकि ऐसा कहने का रिवाज़ था कि उसमें रहने वाली सब
चींटियाँ बहुत प्रेम से एक साथ रहती थीं लेकिन शक्कर के बँटवारे को लेकर छोटी मोटी
झड़पें होती ही रहती थीं। छोटे झगड़ों में बड़ी गालियों का प्रयोग कस्बाई बिलों की
बड़ी विशेषता थी। महानगरीय बिलों में छोटे झगड़ों में मुस्कुराकर काम चला लिया जाता
था और बड़े झगड़े कभी होते नहीं दिखते थे। बड़े झगड़े होते ज़रूर थे।
सुधा चींटी अनार की
तीसरी जड़ वाली गली में रहती थी। पाँचवीं जड़ वाली सड़क पर एक होमसाइंस कॉलेज था जहाँ
चींटियों को अच्छी गृहणियाँ बनना सिखाया जाता था। अच्छी गृहणियाँ सिलाई, कढ़ाई और
बुनाई जानती थीं, शक्कर को सर्दियों तक सुरक्षित रखना जानती थीं, पति चींटियों को
प्रसन्न रखने के तरीके जानती थीं। अच्छी गृहणियाँ महिला चींटियों की मासिक पत्रिका
बिलशोभा पढ़ती थीं। वह चींटी समाज की सर्वाधिक बिकने वाली पत्रिका थी। उसमें सम्पादक
मंडल द्वारा गढ़ी गई पाठकों की व्यक्तिगत समस्याओं पर परामर्श भी दिया जाता था,
जिन्हें पढ़ना सब उम्र की चींटियों को बहुत रोचक लगता था। जड़ों की गिनती ज़मीन में
गड़ी हुई जंग लगी एक कील के नज़दीक वाली जड़ से शुरु की गई थी।
सुधा, तुम कहाँ हो?
सुधा चींटी के अनार की तीसरी जड़ वाली गली में रहने वाली बात पर तुम हँस हँस कर दुहरी
हो जाती। तुम हँसती थी तो तुम पूरी हँसती थी। तुम्हारे आँख, नाक, कान, भौंहें,
कन्धे, बाल, छाती, बाँहें, कमर, कूल्हे, घुटने, एड़ी सब हँसते थे। उतनी सम्पूर्णता
से दुनिया में और कोई नहीं हँसता। तुम्हारी गुमशुदगी का विज्ञापन निकलवाना हो तो
यही निशानी लिख देना काफ़ी है कि एक पूरी हँसने वाली लड़की गुम है। जिस किसी भी
सज्जन को मिले, अनार की तीसरी जड़ वाली गली तक उसे पहुँचा दे। वह याददाश्त भी खो
चुकी होगी तो भी आगे का रास्ता उसके पैरों को याद रहेगा। उचित ईनाम दिया जाएगा।
लेकिन तुम्हारी
गुमशुदगी तो कहीं दर्ज़ भी नहीं करवाई गई थी। तुम यूं गुम हुई जैसे गुम होना
तुम्हारा जन्मसिद्ध कर्त्तव्य हो। तुम यूं गुम हुई जैसे कोई गलती से धानमंडी में सब्ज़ी
खरीदने निकल गया हो और फिर वहाँ से स्पेयर पार्ट्स वाले बाज़ार की तरफ और वहाँ से
अस्पताल की तरफ और वहाँ से बस अड्डे और वहाँ से डबली राठान।
आप जो पहली चीज
माँगते हैं
वह उम्र ही कम्बख़्त
ऐसी थी कि बाकी दिल विल एक तरफ, हम सब सुन्दर लड़कियों को पाने के लिए कुएँ में भी
कूद जाने को तैयार हो जाया करते थे। संजय का कहना था कि लाइट बुझाने के बाद तो सभी
ऐश्वर्या राय लगती हैं। लेकिन इस परम सत्य को जान लेने पर भी कोशिश यही रहती थी कि
दिन के उजाले में भी ऐश्वर्या राय नहीं तो कम से कम दिव्या दत्ता तो लगे। हम सब
अपनी अपनी दिव्या दत्ताएँ ढूंढ़ रहे थे। नीलम मेरी दिव्या दत्ता थी। वह मेरा सबसे
बड़ा मेडल थी, मेरी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि। मेरा मन करता था कि मैं चिल्ला
चिल्लाकर पूरे शहर से कहूं कि होमसाइंस कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की मेरी पत्नी है।
यह ख़याल ही इतनी तुष्टि देता था कि मैं कई दिन तक बिना अन्न पानी के रह सकता था। मैं
उसके साथ चलता था तो मेरा सीना तन जाता था। मैं चलते चलते अक्सर उसके कंधे पर हाथ
रख लेता था। मेरा उसे बैठक में सजाकर रख देने का मन करता था। मेरा उसे फूले हुए
गुब्बारे की तरह भींचकर फोड़ने और नींबू की तरह निचोड़ने का मन करता था। शुरु के
दिनों में तो यह बेहद अमानवीय सा अनुभव लगा था कि सुन्दरता को कुचलना और निचोड़ना
अच्छा लग रहा है लेकिन बाद में ऐसा लगने पर गर्व होने लगा। मेरी दिव्या दत्ता हर
सुबह और उजली, और खट्टी, और नींबू दिखाई देती थी। वह मुझसे बहुत प्यार करती थी और
मैं उससे। ऐसा हम एक दूसरे से बार बार कहते थे।
एक बहुत रूमानी रात
में जब हम आमने सामने बैठकर चाय पी रहे थे और एक दूसरे को अनवरत निहार रहे थे तो
वह अचानक अपना कप रसोई में रख आई। उसमें आधी चाय बची थी।
मैंने पूछा- क्या
हुआ जान?
- यूं ही किसी की
याद आ गई।
- तुम सामने होती
हो, तो मैं तो सब कुछ भूल जाता हूं बाइ गॉड।
- मेरी एक जूनियर थी
रवीना...
रवीना यानी सुधा का
भाई। सुधा का भाई यानी सुधा।
सुधा कहाँ है?
मैं कुछ बोला नहीं,
लेकिन मेरा मुँह खुला रहा कि वह कुछ खास बोलेगी।
- वह चाय बहुत अच्छी
बनाती थी।
- बस्स?
मेरा मुँह गहरी साँस
के साथ अब बन्द हुआ। फिर वह हँसी।
- उसकी एक अजीब सी
बात है, लेकिन तुम रहने दो। तुम्हें नहीं बताती।
- अब ऐसी भी क्या
अजीब है?
वह मुस्कुराती हुई
चुपचाप उठकर चल दी।
- इतना माहौल क्यों
बना रही हो? अब बता भी दो ना।
मैंने उसे पकड़कर
खींच लिया। वह मेरी झोली में आ गिरी। मुझे दीवार पर शर्ट फैलाकर बैठा कोई याद आया।
- वह अपनी बुआ के
बेटे से प्यार करती थी।
वह फिर मुस्कुराने
लगी।
- तुम्हें एक और बात
बताऊँ?
- हाँ...
- यह और भी अजीब है।
मैंने तीन सेकंड में
अपनी पहुँच की सब विचित्र बातें सोच लीं। लेकिन मैं जानता था कि जो वह बोलेगी, वह
मैंने सोचा नहीं होगा।
- पर ये नहीं
बताऊँगी। जब हम साठ साल के हो जाएँगे, तब किसी दिन बताऊँगी।
- एक साथ हम साठ साल
के कभी नहीं होंगे। जब मैं साठ का हूंगा, तुम अट्ठावन की होगी और जब तुम साठ की
होगी, तब मैं बासठ का।
- ठीक है बाबा। जब
तुम साठ के हो जाओगे, तब।
- और तब तक मैं टपक
गया तो?
- उंहूं...
- अच्छा ये बताओ कि
रवीना का क्या हुआ?
मैं उसके चेहरे पर
गिरे बालों से खेल रहा था। वह कमाल की सुन्दर थी। उसके लिए हत्या भी की जा सकती
थी।
- होना क्या है? अब प्राइवेट
पढ़ रही है। मुझे तो तुम पढ़ने नहीं देते।
- और?
वह गहरे तक मेरी
आँखों में देख रही थी। मुझे लगा कि वह मेरे साथ खेल रही है। जैसे उसे सब कुछ पता
है, लूडो, इलायची, गिलहरी...सब कुछ। जैसे वह प्लेटफॉर्म पर उतरकर भगवान हो गई है।
मैंने हल्के से उसका
माथा चूमा। कहीं पढ़ा था कि माथा चूमना किसी की आत्मा चूमने जैसा है। लेकिन मेरे
चूमने में डर था और बहुत सारा दुख। दुख हर भाव के साथ स्थाई था। वे रूमानी विषाद
के दिन थे।
वह एक किताब उठाकर
उसके पन्ने पलटने लगी। वह अब भी मेरी बाँहों की ज़द में थी। मेरा मन हुआ कि यदि वह
उत्तर देने के बाद तुरंत ही मेरा कहा भूल जाए तो मैं उससे पूछ लूं कि सुधा कहाँ
है? मुझे सच में लगने लगा था कि नीलम को दुनिया की हर बात पता होगी। अनुराग ने एक
दिन कहा था कि जिसके पास देने को सब कुछ हो, बोले तो एक तरह से भगवान ही हो, उससे
आप जो पहली चीज माँगते हैं, वह तय करता है कि असल में वह क्या है जिसका ना होना
साला आपको खाए जाता है। बाकी तो आप ज़िन्दगी भर बस अपनी फ़ेवरेट चीजों की झूठी लिस्ट
ही बनाया करते हैं।
- लेकिन सबकी लव
स्टोरी में हमारी तरह सब कुछ अच्छा अच्छा नहीं होता।
- क्या हुआ उनकी लव
स्टोरी में?
- उसके पापा को पता
चल गया था।
- फिर?
- छोड़ो चलो। रात में
बुरी बातें नहीं बतानी चाहिए।
- बताओ ना। मैं वादा
करता हूं कि सुनते ही भूल जाऊँगा।
- नहीं, अभी नहीं।
- प्लीज बताओ ना
निलि...
- तुम बहुत मासूम
हो। मेले चुन्नू मुन्नू... –
उसने दोनों हाथों से मेरे गाल पकड़कर खींचे - तुम्हें सब बुरी बातों से दूर संभालकर
फ्रिज़ व्रिज़ में रखने का मन होता है।
फिर वह खिलखिलाकर
हँसी। फिर हमने देर तक प्यार किया और देर तक सोए।
(करीब तीन साल पहले लिखी गई यह कहानी मेरी शुरुआती कहानियों में से एक है। पहला चित्र Kristina Laurendi Havens का है और बाकी दोनों तस्वीरें Sally Mann की हैं।)
(करीब तीन साल पहले लिखी गई यह कहानी मेरी शुरुआती कहानियों में से एक है। पहला चित्र Kristina Laurendi Havens का है और बाकी दोनों तस्वीरें Sally Mann की हैं।)


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