उसने उंगलियों पर गिनी चीजें

उसने उंगलियों पर गिनी चीजें। और एक और झोंका आया, ध‌ड़ से बजी खिड़की। बाल लहरा गए हवा में, उसने अपनी छाया देखी काँच पर। बालों की भी छाया। उसने एक घर देखा सामने जिसके एक कमरे में रोशनी थी और एक बच्चा घुटनों पर झुका बैठा था एक दीवार के सामने।

वहाँ टीवी था क्या
? 


उसने फिर से गिनना शुरू किया। दस्तानों को, मोजों को, चश्मों को। फिर अचानक रुका वह बीच में ही और दायां हाथ, जिस पर वह गिन रहा था, आगे बढ़ाकर हथेली खोल ली उसने, जैसे पानी गिरेगा अभी।

सामने वाला बच्चा अपनी खिड़की पर आ गया था, एक औरत थी उसके पीछे और कोई औज़ार था उसके हाथ में, शायद पेंचकस, जिससे वह उसे खोलने की कोशिश कर रहा था।

कोई चिल्लाया नीचे कहीं
, जाते हुए किसी दोस्त के लिए कुछ शायद, और वे हँसे दोनों। एक कुत्ता भौंकता रहा देर तक।



रोशनी सारी

मैं ख़ुद से निकलकर बहा हूं
तभी रहा हूं

तुम जब पंख लगा रही होती हो
अपने कंधों पर
तो मेरा मन होता है कि धीमे से
उनमें यूं फिराऊं उंगलियां
जैसे देवदूत तुम्हारे बालों में फिराते रहे इतने साल
और तुमने सारी कायनात के गिरने को संभाला

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क़त्ल करने की जगह हमेशा मौजूद रहती है घर में

कमरे दो हों या हज़ार 
क़त्ल करने की जगह हमेशा मौजूद रहती है घर में
मैं एक फंदा बनाके बैठा रहा कल सारी रात
कि तुम जगोगी जब पानी पीने

मैंने अपनी इस आस्था से चिपककर बिताई वह पूरी रात
कि गले में कुछ मोम जमा हुआ है मेरे और तुम्हारे
और वही ईश्वर है
जो हमें बोलनेउछलने और खिड़की खोलकर कूद जाने से रोकता है
जम्हाई लेने से भी कभी-कभी
पर कसाई होने से नहीं

कैसे बिताई मैंने कितनी रातेंइस पर मैं एक निबंध लिखना चाहता हूं
इस पर भी कि कैसे देखा मैंने उसे सोते हुए,
सफेद आयतों वाले लाल तकिये पर उसके गाल,
वह मेरे रेगिस्तान में नहर की तरह आती थी
वह जब साँस लेती थी तो मैं उसके नथुनों में शरण लेकर मर जाना चाहता था
उसकी आँखें उस फ़ौजी की आँखें थींजिसने अभी लाश नहीं देखी एक भी
और वह हरे फ़ौजी ट्रक में ख़ुद को लोहे से बचाते हुए चढ़ रहा है
जैसे बचा लेगा

यूं वो इश्क़ में खंजरों पर चली

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यह चावल का पानी है।

ये आख़िरी दस नोट हैं
कितने दिन लगते हैं एक इंसान को कुत्ता बनने में?

मेरा एक पैर हवा में है
मुझे लेटने दो
यहाँ किसी को काटा नहीं जा सकता, लिखा है  

अगर तुम्हारी और मेरी मोहब्बत के गानों की
कोई सीडी होती
तो उसमें हम लता मंगेशकर से कहते कि बाहर जाकर बैठे  

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मेरे पिता को मारा नागरिक-शास्त्र की एक किताब ने

वे उसे पकड़कर ले जा रहे थे
दो आदमी लम्बे, उसे दोनों बाँहों से पकड़कर हवा में उठाए हुए,
उसके पैर जैसे तैरते थे छटपटाते,
जो पाली थी उसने सात महीने पहले,
वह बिल्ली उसके पीछे दौड़ती जा रही थी
बिल्ली का एक बच्चा जंगले से बाहर कूदा और खो गया

आप कहाँ थे उस समय?
यह मैंने अपने सब पड़ोसियों से पूछा
जो अच्छे और सभ्य थे हर अच्छी तरह से
रोज़ अपने दरवाजों के आगे झाड़ू लगाकर रंगोली बनाते थे,
हैडफ़ोन लगाकर ही सुना करते थे गाने,
मैं जब निकलता था तो उनके बच्चे सिर झुकाकर कहते थे मुझे नमस्ते
एक कुत्ते को ज़रूर बहुत मारा उन्होंने पिछली पन्द्रह अगस्त को
उसका सिर गटर के मुहाने पर मिला बिल्कुल लाल
उसके माथे पर सिंदूर या लाल मिर्च का टीका था,
माफ़ कीजिए कि मैं चीजों को उनके रंग से नहीं पहचान पाता, न ही गंध से
मैं चीजों को उतना जानता हूं बस, जितनी वे मुझसे नफ़रत किया करती हैं

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आ से आम थे पर मुझे एक आरी मिली रखी हुई

आप सीधे मुझपे चढ़के आए
पहले आज़ादी आई
फिर आए दौड़ते हुए फ़ौजी
उनकी याददाश्त को आपने उनके मैट्रिक के सर्टिफिकेट के साथ
स्टैपल करके रखा था अपनी दराज़ में
वे मुझे ऐसे पहचानते थे
जैसे एक अँधेरा पहचानता है दूसरे अँधेरे को

वे चिल्लाए किसी गैर सी भाषा में
और जहाँ दिल हो सकता था मेरा
वहाँ उनके जूते थे

वे नाराज़ थे हर चीज से
और हममें से जो मरे, वे भी उन्हें ख़ुश नहीं कर सके
उनका कुछ खो गया था
जिसे वे लाशों में ढूंढ़ा करते थे

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घटनाओं को धोखा दो

कैसे सोचते थे ना
कि तुम पुल बनोगे 
और एक दरिया था
, जिससे तुमने कहा
कि दोपहर के दो बजे हैं 

जबकि समय बस तुक्के का था
किसी ने कहा, कुछ करोड़ लोगों ने
और तुमने माना कि यही समय है

तुम्हारी हथेली पहले फिसलती थी हाथ से
या अलग होती थी, कौन जाने
पर सब कुछ अपने गिरने को बचा रहा था
लाल रंग फटता था आँखें मींचते ही

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सिर में लोहा

वे जब भी मेरी नाप लेते
गरदन पर ठहरते थोड़ी ज़्यादा देर
इसीलिए जो जो कपड़े चमकते थेजिनसे आता था रुआब
वे सब गले पर तंग थे
जितने भी जूते थे अच्छे
सब काटते थे,
जब घर था
मैं उसमें कम रहता था
जब नहीं थातब ज़्यादा 

वे सब जल्दी में थे अच्छे लोग और विनम्र,
जिन्हें मैंने अपनी भूख के बारे में बताया
उछलकर नाले में गिरा आख़िरी सिक्का
जब मैं दौड़ रहा था,
मैं इतना नीचे था गहरे धंसा कि हमारी ज़बान एक थी,
यह ख़ुशकिस्मती है धरती की और आपकी 

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लो हम डूबते हैं

हाँ हाँ, यादों में है अब भी
सभी तस्वीरें- Elliott Erwitt
क्या सुरीला वो जहाँ था
हमारे हाथों में रंगीन गुब्बारे थे
और दिल में महकता समां था।
वो तो ख़्वाबों की थी दुनिया
वो किताबों की थी दुनिया
साँस में थे मचलते हुए जलजले
आँख में वो सुहाना नशा था।
क्या ज़मीं थी, आसमां था
हमको लेकिन क्या पता था,
हम खड़े थे जहाँ पर
उसी के किनारे पे गहरा सा अन्धा कुँआ था...
                                  - पीयूष मिश्रा, गुलाल (2001-2009-?)

लालकिले के ठीक सामने मैं दरियागंज को ढूंढ़ रहा था। वहाँ से लहराता तिरंगा दिख रहा था, जो न जाने क्यों आज़ादी की बजाय ग़ुलामी का अहसास करवा रहा था। बहुत भीड़ थी। लालकिले के सामने से गुज़रने वाले क़रीब चालीस प्रतिशत लोग मुँह उठाकर उसे देखते हुए चलते जाते थे। इस तरह आसानी से उन लोगों को पहचाना जा सकता था, जो दिल्ली से बाहर के थे। कुछ लोग पन्द्रह या बीस सालों से भी दिल्ली में रह रहे होंगे लेकिन वह हर आदमी सामने से गुज़रते हुए हसरत भरी निग़ाह लालकिले पर ज़रूर डालता है, जिसका बचपन दिल्ली में नहीं बीता। यह ग़ौर करने लायक बात है कि आक्रमणकारियों द्वारा जनता को लूट कर बनवाई गई इमारतें ही उन मुख्य पर्यटन स्थलों में हैं (उनमें से अधिकांश लाल हैं जो कि संयोगवश खून का रंग भी है), जिन्हें देखने मासूम से बच्चे स्कूल की मैडमों के साथ कतार बनाकर आते हैं।

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एक साँवली लड़की जिसकी उम्र नौ साल

उनकी आँखों में सुन्दर पत्थर हैं
ज़बान पर अंग्रेजी जैसे खरीदकर रखी है महंगी
वे अपने चलने में
मेरी हडि्डयां तोड़ते हैं मन में,
सब बड़े लोग
उनके भाई या प्रेमी या दोस्त हैं या होने वाले हैं
उन सबको दुनिया बचाने की फ़िक्र है सोते-जागते
जिसकी बात वे एक सौ अड़तीस रुपए की कड़वी कॉफ़ी पीते हुए करते हैं अक्सर

वे हमेशा विदेश से लौट रहे होते हैं
वे हर सुबह कॉर्नफ्लेक्स खाकर पाइनएप्पल जूस पीकर
करते हैं हिन्दी साहित्य को समृद्ध
बनाते हैं ग्लोबल
मैं हर रोज़ उसमें थोड़ा आम का अचार रखता हूं
उसमें भी फफूंद

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