अवसाद में डूबे आत्मकथ्य - 1

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8 नवम्बर के रसरंग (दैनिक भास्कर) में प्रकाशित


मैं एक रेलवे स्टेशन की बेंच पर पड़ा दर्द से छटपटा रहा हूँ। मेरे सिर में भयंकर दर्द है और मैं जीवन में पहली बार भगवान को याद करता हूँ। मुझे पूरा यक़ीन है कि वह कहीं नहीं है। क्या यह देवदास का सा अंत है? एक चाँद सी लड़की आकर मेरे कानों में फुसफुसाती है कि हम दोनों साथ मरेंगे। क्या यह उसका आग्रह है कि मैं उसका गला दबाकर अपने साथ मरने का मौका दूँ? वह बेंच पर मेरे ऊपर लेट गई है। इस तरह, जिस तरह स्टेशन पर कोई नहीं लेटता। उसके घुटने मेरे घुटनों पर, उसकी आँखें मेरी आँखों में। उसके शरीर में बेसन और मिट्टी के तेल की ख़ुशबू बसी हुई है।

- मैं तुम्हारी हूँ।

वह कहती है और जिस क्षण मैं दुनिया का कोई स्वामित्व नहीं चाहता, सुबह के छ: बजे उगते चाँद सी एक लड़की मेरी है। मैं दर्द के कीचड़ में लथपथ हूँ। ऐसा लगता है कि मेरी धमनियों में बहते हुए खून में तेज़ाब मिला हुआ है। एक भीड़ हमारे चारों ओर इकट्ठा हो गई है। उसमें तरह तरह के लोग हैं। वे सब हम दोनों को एक साथ ज़मीन में गाड़ देना चाहते हैं। हम दोनों हाथ बढ़ाकर उनकी मदद करते हैं। किसी को ज़मीन में गाड़ देना क्रोसिन पेन रिलीफ़ जैसा ही तो है। उन लोगों को अपनी अपनी रेलगाड़ी के आ जाने से पहले यह काम पूरा करना है। उनके घरों में इंतज़ार करती पसीने से भीगी हुई औरतें और कार्टून नेटवर्क देखते हुए बच्चे हैं। वे उनसे अनकहा वादा कर आए हैं कि हर महीने उनके लिए मोटी तनख़्वाहें लेकर आएँगे। उनका सारा प्यार और परिवार इसी तनख़्वाह पर टिका है। वे औरतें, जिनके दिमाग इतने ग़ुलाम हैं कि उन्हें बहुत पहले ही मर जाना चाहिए था। वे बच्चे, जो बेवकूफ़ और ख़ुश हैं। भागवत पढ़ते हुए वे बूढ़े, जिन्हें डायबिटीज है और जिनकी जवानी सस्ते जासूसी उपन्यासों के भरोसे गुज़री है।

- तुम हमारी सभ्यता के लिए ख़तरा हो।

भीड़ ने मेरे सामने की लाल दीवार पर सफेद रंग से लिख दिया है। मैं उसके नीचे लिखता हूँ कि मैं किसी सभ्यता को नहीं पहचानता। वह लड़की चुप है। मैं जानता हूँ कि वह अब नहीं बोलेगी। भीड़, जिसका कोई चेहरा और चेहरे पर आँखें नहीं हैं, उसके उभारों को खा जाना चाहती है। भीड़ में स्त्रियाँ भी हैं मगर भीड़ आश्चर्यजनक ढंग से पुरुष है। उन्होंने बहुत सारी किताबें लाकर हमारे ऊपर पटक दी हैं। वे किताबें, जिनके प्रति बेशुमार घृणा के बावज़ूद, परीक्षाओं में पास होने के लिए जिन्हें हमने साथ साथ पढ़ा है। वे किताबें, जिन्हें आत्ममुग्ध आई ए एस अफ़सरों और मोटे प्रोफ़ेसरों ने मिल-जुलकर लिखा है (शायद अगस्त की गीली शामों में एक दूसरे के सरकारी क्वार्टरों में पकौड़ियाँ खाते हुए), जिनके पहले और आख़िरी पन्नों पर दो दो बार उनकी क़ीमत लिखी है और जो महंगी साड़ियाँ खरीदती हुई गुमनाम पत्नियों और अनपढ़ माँओं को समर्पित हैं। जिनकी प्रस्तावना में लेखक अपने आप को इतना अज्ञानी मान रहे हैं कि विनम्र होकर टूट टूट जाते हैं।

- यह है हमारी सभ्यता, हमारा ज्ञान और इतिहास।

वे सब एक स्वर में कहते हैं। वे सब कुछ जानते हैं। उन्हें सब कुछ याद है - तैमूर से लेकर मैकाले तक लेकिन वे बार बार भूल जाते हैं और किताबें उठा उठाकर खोजते हैं। इस हड़बड़ी में आधी किताबें उनके पैरों के नीचे हैं, जिन्हें छूकर वे बार बार उस हाथ को माथे पर लगाते हैं।
फिर वे एक अंतहीन गड्ढ़ा खोदते हैं और तब हमें बुरी तरह से भयभीत कर देने में सफल हो ही जाते हैं। मैं बारी बारी से उन सबके पैर पकड़ता हूँ और माफ़ी माँगता हूँ। इस बीच उन्होंने हम दोनों के अंतरंग क्षणों की कुछ तस्वीरें खींच ली हैं, जिन्हें वे अपने सरकारी टेलीविजन पर साढ़े आठ बजे के समाचारों से पहले के कुछ मिनटों में दिखाएँगे। कुछ पैसे लेकर वे हमें जीने का मूलभूत अधिकार बख़्श देते हैं। वह उठती है और मेरी कायरता पर नाराज़ होकर चली जाती है। उसका नाम क्या था, मुझे याद नहीं। मैं तरस खाने लायक एक भुलक्कड़ बेचैनी में ज़िन्दा हूँ और मर गया हूँ।


तलाशता हूँ जेबें

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घोड़े दौड़ते हैं नींद में,
उन्हें बेचकर सो जाती हो तुम।
हम अपने सपनों में आग लगाकर
दिन रात रोशनी बाँटते हैं अथक,
तुम मुझे देखती हो ऐसे
जैसे काँच को देखती हो
और शोर के पीछे की गली में
हम लावारिस पड़े हैं।
हाँ, तुम थोड़ी आश्वस्त।

जीत की तालियों की गगनचुम्बी गड़गड़ाहट के बिना
हम जान झोंककर तमाशा करते हैं दोस्तों!
यह और बात है कि
हमारी आँखों के नीचे पड़े काले गढ्ढों
और दुखती काँपती टाँगों से आप होते हैं विकर्षित
और खाली बोतलें फेंकते हैं।
मगर यकीन मानिए,
जिस समय हमें अपने बिस्तरों में दुबककर प्रेम करना चाहिए था,
हम आपके लिए गीत लिख रहे थे।

आप बार बार यही क्यों कहते हैं
कि वे बुरे बने।
उन्हें छोड़कर क्या आप
कल रात भर मेरे जागने के बारे में दो बातें करना चाहेंगे?

कैसी हवा चलती है माँ,
बार बार लगती है भूख,
तलाशता हूँ जेबें।

उन देशी विदेशी नीली फ़िल्मों ने हमें जिलाए रखा

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यह 'ब्लू फ़िल्म' नामक कहानी का चौथा हिस्सा है। पहले तीन हिस्से ब्लॉग पर बहुत दिन पहले पोस्ट कर चुका हूँ। फिर लगा कि ब्लॉग पर शायद लोग लम्बी कहानियाँ नहीं पढ़ते, इसलिए रुका रहा। पिछले कुछ समय से कई साथियों ने लगातार कहा कि मैं पूरी कहानी ब्लॉग पर डालूँ, इसलिए इस चौथे अंश के साथ कहानी को आगे बढ़ा रहा हूँ। जिन्होंने इंतज़ार किया, उम्मीद करता हूँ कि वे क्षमा करेंगे। हालांकि लम्बी प्रतीक्षाएँ ऐसी पीड़ा देती हैं, जिनके लिए माफ़ी सम्भव नहीं ...फिर भी अंग्रेज़ी में कहूँ तो please bear with me...
भाग 1 जामुनी जादू
भाग 2 पापा जल्दी घर आ जाओ

भाग 3 मैंने देखा कि मेरी तीन माँएं हैं



घर के बाहर भीड़ लगी थी। तीन लड़के लता का पीछा करते हुए घर तक आए थे। लता ने तेजी से अन्दर घुसकर माँ को बाहर बुला लिया था और बताया था कि कई दिन से ये लड़के ब्यूटीपार्लर से घर तक उसके पीछे आते हैं। माँ उन लड़कों को रोककर गालियाँ देने लगी थी। वे लड़के भी हँस-हँसकर जवाब दे रहे थे। आस पड़ोस के और राह चलते लोग आ जुटे थे। अच्छा खासा तमाशा बन गया था।

पिताजी कुछ देर से बाहर आए। तब तक माँ अकेली बोलती रही। उसने लता को अन्दर भेज दिया। मैं घर में नहीं था। मैं यादव के घर में पड़ा रागिनी को याद कर रहा था। कोई पड़ोसी कुछ बोल नहीं रहा था। माँ चिल्लाती चिल्लाती रोने को हो गई थी। लड़के खड़े बेशर्मी से हँसते रहे थे।

पिताजी चश्मा लगाते हुए बाहर निकले। उन्होंने सफेद कुरता पायजामा पहन रखा था। उनके चेहरे पर कुछ था कि उनका अध्यापक होना पहली नज़र में ही पता चल जाता था। ऐसा लगता था कि उन्हें मारो तो वे सिर्फ़ धमकाएँगे, मार नहीं सकेंगे। उन तीन लड़कों में जो लड़का मुख्य लड़का था, वह गली की एक बूढ़ी औरत को बुला लाया। वह उसके उस दोस्त की माँ थी, जिससे मिलने वे तीनों रोज़ शाम को आते थे। उस बूढ़ी औरत ने चिल्ला चिल्लाकर इस बात को सत्यापित किया। पिताजी चुप रहे। हो सकता है कि पिताजी कुछ बोले भी हों मगर वह किसी को सुना नहीं। भीड़ और बढ़ गई थी जैसे शाहरुख़ ख़ान की कोई फ़िल्म चल रही हो। फ़िल्म होती तो उस दृश्य में मेरे पिताजी को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया जाता। सब मुख्य लड़के की मुस्कुराहट पर तालियाँ बजाते। मैं और लता भी हॉल में बैठकर ऐसी कोई फ़िल्म देख रहे होते तो पिताजी को खलनायक ही समझते। वैसे वे पूरी फ़िल्म के खलनायक या नायक कभी नहीं बन सकते थे क्योंकि वे अध्यापक थे। उनका एक ही सीन होता।

पिताजी ने थोड़ी तेज आवाज़ में उन्हें चले जाने को कहा तो भीड़ को सुना। भीड अब पहले से धीरे फुसफुसाने लगी। यह उन लड़कों को अपमानजनक लगा। मुख्य लड़के ने हँसना बन्द कर दिया। उसके पीछे पीछे बाकी दोनों लड़के भी गंभीर हो गए। सब वहीं खड़े रहे। फिर अचानक मुख्य लड़का तैश में आ गया और उसने पिताजी को गाली दी।

वह एक लम्बी गली थी, जिसमें हमारा घर था। उस गली के दोनों कोनों पर खड़े आदमियों ने वह गाली सुनी। हमारे घर के पचास मीटर के दायरे में ही साठ सत्तर लोग होंगे। घरों में बैठे लोगों और छत से देख रहे लोगों के साथ गाय, भैंसों, कुत्तों, चिड़ियों, कबूतरों, मेंढ़कों और चूहों के कानों को जोड़कर ठीक ठीक हिसाब लगाया जाए तो करीब दो हज़ार कानों ने वह गाली सुनी। मेरी जानकारी में पिताजी को ऊँचा तो नहीं सुनता था, लेकिन और कौनसी वज़ह हो सकती है कि पिताजी ने पूछा, क्या?

यह क्या उन लड़कों को किसी चुटकुले सा लगा और वे हँस दिए। भीड़ चुप, जैसे भीड़ को अजगर सूंघते हों। दो क्षण के लिए भीड़ का सिर झुका और फिर उठ गया। आँखें तीर की तरह हमारी देहरी पर। माँ, जिसे कभी कभी ऊँचा सुनता था, उसने अपनी बाटा की चप्पल उतारी और लड़के के मुँह पर दे मारी। माँ का निशाना इतना अच्छा नहीं था लेकिन लड़का बचने के प्रयास में नीचे झुक गया तो चप्पल सीधे उसकी नाक पर लगी। भीड़ हँसी, भीड़ फुसफुसाई, अजगर सूंघता हुआ लड़कों के पास आ खड़ा हुआ। लड़के स्तब्ध से कुछ क्षण खड़े रहे और फिर चले गए। पिताजी भीड़ के पार से गली के दूसरे मोड़ को देखते रहे। माँ ने नाली के पास पड़ी अपनी चप्पल उठाई और एक चप्पल पैर में पहने, एक हाथ में लिए भीतर चली गई। भीड़ भी छँट गई।

उस रात माँ ने राजमा की सब्जी बनाई। मैं उसी के साथ रोटियाँ खा रहा था, जब माँ ने मुझे शाम की पूरी घटना सुनाई। मुझे लगा कि उस घटना को सुनकर मुझे ज़ोरों से गुस्सा आना चाहिए था, जो नहीं आया। मैंने और दिनों की अपेक्षा आधी रोटी ज़्यादा ही खाई होगी। माँ बीच बीच में रोने लगती थी। मुझे दुख होता था। लता अन्दर बैठी किसी पत्रिका का बुनाई विशेषांक पढ़ रही थी। उस रात पिताजी मुझे नहीं दिखे, हालांकि वे घर में ही थे।

शाम को मैं यादव के घर में पड़ा रहा था। मैं रागिनी के गीत गाता रहा था और वह उकताकर अपना ब्लू फ़िल्मों का कलेक्शन उठा लाया था। उसके पिता का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था। उनके घर वी.सी.आर. था।

- इसके कितने सही हैं ना यार! बस ऐसे मिल जाएँ एक बार...

- फिर क्या करेगा?

- फिर तो वही बताएगी कि क्या किया?

उसने ऐसा चेहरा बनाया कि उसके दिमाग में बना चित्र मुझे साफ साफ दिख गया। मुझे हँसी आ गई। मैं उठकर बैठ गया और यादव की तरह टकटकी बाँधकर टीवी देखने लगा।

वह ख़ुशी नहीं थी, जो हमें उन फ़िल्मों को देखकर मिलती थी। या तो वह उम्र ऐसी थी या वह समय, या वह शहर, कि हमारा रोने का मन करता था तो भी हम ब्लू फ़िल्में देखते थे, गुस्सा आता था तो भी, प्यार के बिना जीना असंभव लगने लगता, तो भी...

हमारी आँखों की कोरों में इतनी बेचैनी भरी पड़ी थी कि उन दिनों वे फ़िल्में न होती तो हम आत्महत्या कर लेते। उन देशी विदेशी नीली फ़िल्मों ने हमें जिलाए रखा। वे फ़िल्में हमारी भगवान थीं।




सूरज नहीं है वहाँ

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तुम जब ट्रेन में उन्हें घूरते हो
उनके चरित्र की थाह पाने को
या कहा जाए कि
खोजते हो एक इशारा, एक दृष्टि
या इस तरह एक अदद मौका उन्हें क्रूरता से भोगने का
तब वे किसी एक दिशा की ओर लगातार ताक रही होती हैं
और पूर्व नहीं है वह दिशा,
सूरज नहीं है वहाँ।

तुम अँधेरा पोत देते हो
उनके सुनहरे गालों पर,
उनके सपनों के कपास पर
छिड़क देते हो कोयला।

मुश्किल दिनों में वे लपककर आती हैं भूख की तरह
और परीकथाएँ सुनाती हैं अनंत।

हम अकेले खोद लेंगे सारे कुएँ

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अचानक किसी कोने से निकल आओगी तुम एक दिन
और जब हम राख की कल्पना में
रो रहे होंगे बेहिसाब
या बरसता होगा अमृत
तब हम यूँ ही संयोगवश जान लेंगे
ख़ुशी के तरीके।

वे सब जब किसी हॉल या मन्दिर में जमा हो रहे होंगे दोस्त,
तब मैं तुम्हें मोटरसाइकिल की लाँग ड्राइव पर
दूर किसी सुन्दर गाँव में ले चलूँगा
या हम भूल जाएँगे षड्यंत्रों से भरी
अपनी भदेस भद्दी संकरी पथरीली भाषा
और मैं तुम्हारे स्तनों से खेलते हुए
एक नई पतंग, नए आसमान के बारे में बताऊँगा।

मैं तुमसे जिस रोज़ नींद माँगूंगा,
सोती रहना देर तक
और भूल जाना।

हम अकेले खोद लेंगे सारे कुएँ,
हम अकेले छील लेंगे सारे खेत,
आ जाइए, हम अकेले देंगे आपके बदतमीज़ मुश्किल प्रश्नों के सारे उत्तर
और आपका चेहरा भाड़ में झोंक देंगे।



हिज़्र

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यूँ मैं झेलता तुम्हारे जाने की आवाज़
कि सीढ़ियों पर बिछा देता अपनी आँखें
और नीचे की ओर धंसती इस कुतुब मीनार से
नीचे फेंकता कीचड में
अपनी कविताएँ एक एक करके।
मैं तुम्हारे जबड़े में डालता अपना दिमाग
और शराब की बासी गंध के बीच
तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।

मैं जिस दिन मरता
उस दिन कुत्ते रोते
और चिडियाएँ
गिलहरियाँ और रात के आत्मघाती अंधेरे भी।

मैं यूँ अकेला बैठकर ना देखता तस्वीरें
और ना करता प्रार्थनाएं,
तुम्हें पुकारता और तुम लौट आती
मेरे ध्वस्त होने से ठीक पहले।

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।

छूटी हुई लिपस्टिक

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वे तुम्हारी पागल रातों में
तलाशती हैं अपनी छूटी हुई लिपस्टिक
और यकीन करती हैं, तबाह होती हैं
वे चली जाना चाहती हैं
और लौट आना भी,
वे किसी गहरे रंग की पतंग पर बैठकर
परी या माँ बनने को
गायब हो जाना चाहती हैं दरअसल
और तुम उन्हें बताते हो कि
उन्हें डॉक्टर बन जाना चाहिए
और उस उजड़ी हुई महानता में
तुम उन्हें खूबसूरती से धकेलते हो बार बार
जहां तुम बीमार हो
और तुम्हें खेलना है उनकी लटों से,
शिकायतें करनी हैं
और तुतलाना है.

एक उदास रात में
तुम खोलते हो अपने काले रहस्य
और अपनी अनिद्रा के चुम्बनों से उन्हें जला डालते हो,
फिर एक सुबह तुम घर से निकलते हो
पूर्व के जंगलों की ओर
और महान हो जाते हो.

वे अकेली जलाती हैं चूल्हे,
काली पड़ती हैं
और माँ हो जाती हैं.

छतों से कूदकर नहीं आती मृत्यु

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अपने दुखों की छाया में बैठकर
हम चरखा कातेंगे गांधीजी!
क्या आप देखते हैं?
उन्हें पहनकर खुश होंगे हमारे नंगे बच्चे
और मान लेंगे कि
वे और बच्चों की तरह
भव्यताओं की संतानें हैं,
हमारी असमर्थताओं की नहीं।
वे अंग्रेज़ी पढ़ेंगे और चहकेंगे।
नहीं पढ़ेंगे हमारी कवितायें।
पढ़ लेंगे तो मर नहीं जायेंगे क्या?

वे बच्चे हैं
और उन्हें ख़ुश रहना चाहिए।

छतों से कूदकर नहीं आती मृत्यु।
वह जीवनदायिनी स्त्रियों की आँखों में छिपकर बैठी होती है कहीं।
तुम्हारे हर झूठ से
मेरा एक हिस्सा अपाहिज हो जाता है
तुमसे मोहब्बत
अधरंग से होते हुए
मेरी मौत पर ख़त्म होगी।

कहाँ हो हे ईश्वर?
क्या बीच का कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता
जिस पर हम एक दूसरे के रास्ते ना काटें
और रोटी खाएं, पानी पियें, रो लें और
सो जाएँ ठीक से हर रात।

मैं तुम्हारे गले लगूँ
और मर जाऊँ।

बहुत दूर तक घेरकर मारते हैं पुराने सुख

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वे सब सवार होकर आते हैं
चमचमाती गाड़ियों पर,
हमारे सब दर्द और सुख,
वैभव और नंगापन,
हमारे दिमाग की गांठें,
ह्रदय के थक्के,
बांहों की शिथिलता,
उदास बचपन, ऊंची बांहों का लड़कपन,
माथे पर पसीना, धूप,
बैंगनी बालियाँ तुम्हारी
और प्रतीक्षा,
जिसका मैं सजायाफ्ता हूँ
और तुम लौटती हो हर शाम बस से।
कहाँ जाती हो और क्यों?
और क्या चाहिए तुम्हें?
सब कुछ छीने जाने के बाद की बेबस तड़प के अलावा
और क्या ही दे सकता है तुम्हें यह खुर्राट विश्व,
जब मैं हूँ तुम्हारे पास,
अपने दुःख को बोरी में लपेटकर
उस पर बैठा हुआ,
उसे खाता हुआ चप चप।

यह थकानों का शहर है
जिसके हर बच्चे को जीनी है
अपने अपने हिस्से की थकान।
हमें मैकडॉनाल्डों में बैठकर स्थगित करनी हैं
अपनी अपनी आत्महत्याएं।
जब हम टूटते हैं
और अन्दर एक वहशी अँधेरे की भूख के शिकार बन
काले होते जाते हैं,
तब हमें चित्रकथाएं लिखनी हैं
और गाने हैं हिन्दी फिल्मों के घटिया गाने।

वेक अप सिड!
यह उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं का समय है
जहां पहाड़ पर पहुँचने के लिए
तुम्हें लम्बे, भव्य, अंग्रेजी ढंग के गलियारों में
दाबने हैं कामुक बुजुर्गों के पैर,
जब तुम्हारी जीभ को
तीली दी जा रही हो तो
तुम्हें 'आ आ' कहते हुए
मुंह खोले रखना है।
यह शल्य चिकित्सकों का शहर भी है,
वे फाड़ते हैं तुम्हें
वज्जनबाई की ठुमरियां सुनते हुए
और जब तुम आतंकित हो,
हतप्रभ और क्रोधित
जैसे कॉलेज की रैगिंग में नंगे हो रहे हो
और यह हंसने की बात है,
हा हा हा हा!
नीचे घास है,
जिसे कुचलते हुए टूट टूट जाते हैं पैर
और तुम कहती हो
चार बूँद या टपाटप, मूसलाधार भी हो बारिश
तो नहाने, नाचने लगूँ।

माँ के हाथ का चूरमा
पेट में उतरता चला जाता है
आत्मा को छीलता हुआ।

बहुत दूर तक घेरकर मारते हैं
पुराने सुख।

प्यार

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मेरे होने से बहुत पहले से थी माँ
और मेरे पिता
जो एक किसान थे,
किसान न रह सके।
वे एक पहाड़ पर गए
और दूब बन गए
अर्थात् उन्होंने काटी घास
और सूर्यास्त के समय जब वे लौटते थे,
तो ऐसा कहा जाता है कि
नहीं बजती थी दुदुम्भियाँ
और माँ जो रोटियाँ रचती थी,
उनमें से कोई नहीं थी गोल।

माँ सुंदर और पिता चुप्पे थे,
ऐसा लगता है मुझे।

बहुत दूर जो घड़ियाल बजता था रात में,
उसे भरे पेट नहीं सुना जा सकता।
बहुत दिनों तक नहीं खाई जा सकती उम्मीदें
और उन दिनों,
जब आपातकाल था,
उन दोनों के पास आत्महत्या कर लेने के
अपने अपने ग़ैर राजनैतिक कारण थे।

मैं जब गर्भ में नहीं था,
तब भी उदास थी माँ
और रो पड़ती थी।
पिता नहीं रोए कभी
और अगर मैंने ऐसा कुछ देखा है
तो वो झूठ होगा।

उस समय की हर तस्वीर में
उन दोनों के चेहरे पर एक स्थाई भाव है
जिसे मैं और आप नहीं समझ सकते।

माँ कहीं घूमने नहीं गयी कभी,
पिता ज़रूर गए दो चार शहर
और पूरियां और अचार ले गए।
बहुत दिन तक रहना हुआ बाहर
तो लिख देते थे, ठीक हूँ।

ऐसा नहीं हुआ कभी
कि करवट लेकर लेटी माँ ने पूछा हो,
" प्यार करते हो तुम मुझसे?"
और पिता ने "हाँ" कहा हो
या माँ के होठों को चूम लिया हो।
यह ज़रूरी भी नहीं था।