बारहवीं ए की लड़कियाँ


Photo- 4 Months, 3 Weeks and 2 days
भाई जेल में था। अपने जन्मदिन के अगले दिन से। मैं हर महीने की पाँच या आठ तारीख को उससे मिलने जाती थी। कैमेस्ट्री के ट्यूशन के बाद। ट्यूशन लगभग ज़रूरी से हो गए थे, आप पढ़ना चाहें या न चाहें। एक फ़ायदा यह था कि हरनाम सर स्कूल टेस्ट के सारे प्रश्न ट्यूशन वालों को पहले ही बता देते थे और दूसरा, प्रैक्टिकल में जब बाहर से आया एग्जामिनर उनके घर बैठकर बालूशाही खा रहा होता था तो वे उसके हाथों में एक लिस्ट थमा देते थे। उसमें उन्हीं लड़के लड़कियों के नाम होते थे जो हर महीने उन्हें साढ़े पाँच सौ रुपए देते थे। और पैसा मेरे पापा के पास बहुत था। 



इस कविता में शहद नहीं है

आपका ध्यान जाए या न जाए 
लेकिन किसी भी एक मिनट में मैं मारा जाऊँगा
या बहुत हुआ तो इकहत्तर सेकंड में

तब आप क्या करेंगे, बताइए
किसे किसे करेंगे फ़ोन
कितनी मिनट तक नहीं हँसेंगे
कितने दिन बाद कहने लगेंगे बिना आवाज़ के लड़खड़ाए
बिना भूले कि शाम को क्या क्या लेकर लौटना है घर
कि हां, वो हुआ करता था एक आदमी, जो बोलता कम था और मर गया 

क्या मेरी किसी भी तस्वीर में मैं हूँ?



वे रेल के पिता नहीं हैं


वे मेरे लिए पूरियां लेकर आए हैं। ट्रेन चलने वाली है। वे चाहते हैं कि मैं अभी खा लूं, उनके सामने। मुझे भूख नहीं है और मैं उस ट्रैफ़िक पुलिस वाले पर अभी तक झल्ला रहा हूं जिसकी वज़ह से आज ट्रेन छूट सकती थी। उन्हें लौटना है क्योंकि वे जिन जगहों पर लौटते हैं हमेशा से, जिन कस्बों में वे रहते हैं और जिनमें उन्होंने हमें सुन्दर पाला है, उनके लिए कहीं से भी अक्सर छ: या सात बजे शाम के बाद बसें या रेलगाड़ियां नहीं मिलतीं। वे फिर से कहते हैं कि मैं पूरियां खा लूं क्योंकि उन्हें प्लास्टिक का यह टिफिन लेकर लौटना है। मुझे सच में लगता है कि उन्हें जल्दी टिफिन लेकर लौटने की है। मैं पूरियों का अखबार लेकर टिफिन उन्हें दे देता हूं और कहता हूं कि रेल चलने पर खाऊंगा। वे उतर जाते हैं।

रेल चल दी है। मैं दरवाजे पर खड़ा हूं। जाते हुए वे बार-बार गिरने को होते हैं। मैं चिल्लाकर किसी से कहना चाहता हूं कि मेरे पिता हैं वे, उन्हें संभालो। लेकिन मैं चुप देखता रहता हूं। अचानक वे रुककर मुड़ते हैं और मुस्कुराते हैं। कुछ चिल्लाते हैं, जो मुझे नहीं सुनता। वे ट्रेन की दिशा में तीन-चार कदम तेजी से बढ़ते हैं और फिर चिल्लाते हैं। मुझे अब भी नहीं सुनता। फिर अपने साथ चल रहे एक आदमी को रोककर मेरी ओर इशारा करके कुछ कहते हैं।

वे रेल के पिता नहीं हैं इसलिए रेल बेझिझक प्लेटफॉर्म से निकल आई है। वे मेरे पिता हैं लेकिन मैं भी निकल आया हूं।  

ऐसे कहाँ जाता हूं और क्यों?

जैसे अब सब ठीक है या हो जाएगा वाला हाथ

हम बस अड्डे से लौट रहे थे। पिता के कन्धों पर एक खाकी सा झोला और हाथ में एक गैलन था। हमें जो सब्जियां खरीदनी थीं, वे नहीं मिली थीं। मिट्टी का तेल मिल गया था। मै कुछ गुनगुना रहा था। अँधेरा होने लगा था। उन्होंने एक खाली गोदाम के सामने से गुज़रते हुए मुझे अपने क़रीब खींचकर मेरे कंधे पर कसकर हाथ रखा था, जैसे वे ईश्वर हों वाला हाथ, जैसे अब सब ठीक है या हो जाएगा वाला हाथ, और कहा था कि बरसों बाद किसी शाम अँधेरा पड़ने पर जब तुम्हारे पास लौटने के लिए कोई घर न हो तो याद करना
और इस समय पर हँसना या रोना मत कि एक इतवार की शाम हम दोनों इस तरह लौट रहे थे, तुमने लाल निकर पहन रखी थी, तुम एक दुकान के बोर्ड पर लिखी लाइनों को गाने की तरह गुनगुना रहे थे, तुम टीवी पर कुछ देखने के लिए उतावले थे और तुम्हें यक़ीन था कि मैं तुम्हें हमेशा इस दुनिया से बचाकर रखूंगा।

मैं बेवकूफ़ों की तरह हँस रहा था। साढ़े सात वाली ट्रेन उस दिन लेट थी। मैंने घर के बाहर खड़ी गाय का कान छुआ था और वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास ले आई थी। दरवाजा खुला मिला था। लाइट नहीं थी और हम सबने छत पर खाना खाया था।



उसके भागने की रात


मैं घर लौटा तो ऐसा था जैसे किसी आदमी को खा जाऊँगा। चाची दरवाज़े पर खड़ी थी और कभी भी गिर सकती थी। पिताजी अन्दर कमरे में बन्द थे और मेरे पहुँचते ही चाची कहने लगी थी कि कहीं वे पंखे से लटककर फाँसी न लगा लें। जैसे वह उन्हें जानती ही न हो कि वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, और जैसे मेरा फ़र्ज़ है कि अभी दरवाज़े में टक्कर मारकर उसे गिरा दूं और उन्हें अपने आत्मसम्मान के साथ चैन से रोने भी न दूं।

By Sally Mann
मैं पसीने से भीगा हुआ था। चाची टेबल फ़ैन इसलिए नहीं चलाना चाहती थी कि फिर हम आपस में तेज़ आवाज़ में बोलते और आवाज़ बाहर जाती। मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आ रहा था और निशा अगर ग़लती से लौट आती तो मैं उसे काट डालता। इसलिए साढ़े तीन घंटे तक उसे ढूंढ़कर लौटने के बावज़ूद अन्दर कहीं मैं चाहता था कि वह न मिले, नहीं आए।

- सुबह तक वो नहीं आई तो मैं घर का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लूंगी और मैं और तेरे पापा जी कभी बाहर नहीं निकलेंगे।

यह एक तरह का नैतिक दबाव था, मुझ पर, कि मुझे उसे वापस लाना चाहिए। वह न मिले तो किसी लड़की को मारकर चाकू से उसके नक्श निशा जैसे बनाने चाहिए और उसमें रुई भर के सुबह से पहले देहरी पर बिठा देना चाहिए।



यहाँ कोई मेरे पिता को नहीं जानता

उधर उन दिनों रेत कहाँ 
खरीदना होता तो आटा खरीदता हर कोई
उसमें भी सौ झंझट
कोई आटा बुरा आटा नहीं
कोई भूख नहीं अच्छी भूख

मज़बूरियाँ देखकर नहीं रुकती रातें
फ़ोन नहीं करती कि आपके पास घर है या नहीं
क्या आप लेना चाहते हैं हमारी कंपनी का क्रेडिट कार्ड, हम अच्छे लोग हैं
वे आती हैं और बताती हैं कि सोने का डिपार्टमेंट कोई और देखता है
जहाँ मैं लेकर घूमता सिक्के और कोई नहीं बताता कि किसे दूँ रिश्वत



सुधा कहाँ है?

शनिवार की रात-अमिताभ के साथ

वे दोनों अक्सर साथ ही रहती थी। जैसे आपका मन किया कि आज सिर्फ़ अकेली मिनी को देखना है गोलगप्पे खाते हुए, जब एक बड़ा सा गोलगप्पा मुँह में भरे हुए उसका पानी उसके होठों के बीच से चोरी चोरी बाहर निकल रहा हो, ठीक उस क्षण या तब, जब रंगरेज़ के सामने खड़ी होकर वह दो उंगलियों के बीच फंसी कतरन में एक हल्की सी डार्क मैरून शेड पर ज़ोर देकर उससे गलत रंग में दुपट्टा रंग देने पर झगड़ रही हो, तो अच्छी खासी संभावना है कि ऐसे मन को आपको महीनों तक मसोसकर रखना पड़े।

ऐसा होता था कि मिनी गोलगप्पा खा रही होती थी तो फ़्रेम में उसकी कटोरी में से पानी पी रही नीलम ज़रूर होती थी या मिनी दुकान वाले से झगड़ रही होती थी तो उसके पास बड़ी सी पॉलीथीन लेकर खड़ी नीलम रिक्शे वालों को रोक रोककर सतबाग का किराया पूछ रही होती थी। उन्हें अलग अलग देख लेना कस्बे की ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाने लायक घटना तो ज़रूर थी। कई लड़के मिनी या नीलम के एक हफ़्ते के अन्दर एक बार अकेले दिख जाने की शर्त लगाकर हार चुके थे और ऐसा भी नहीं था कि वे बाहर कम निकलती थीं। दिन में गोलबाज़ार के दो चक्कर तो पक्के ही थे लेकिन एक दूसरी के बिना?
शायद कभी नहीं।



तुम्हारे नक्शे में साइकिल

एक साइकिल मेरे पास थी
जिसे चलाना तुम सीखना चाहती थी
लेकिन वह हफ़्ता दफ़्तर में बीता
तुम जानती ही हो कि कितना ज़रूरी था काम
मैं कैसे ललचाई नज़रों से कारों को देखता था
कैसे हम नज़रें चुराते थे जब तुम पड़ती थी बार बार बीमार
और ठीक होने का इंतज़ार करते थे
ठीक होने के बाद करते हुए याद
कि ओह, याद ही नहीं रहा हमें कि जाया जा सकता था डॉक्टर के पास

कैसे हम आयुर्वेद और होम्योपैथी और भले बैक्टीरियों के भरोसे ज़िन्दा थे
जो हमारे जिस्म में रेंगते थे
और बाहर सड़क पर इतने सारे
कैसे हमारी चमत्कारों में इतनी आस्था थी
कैसे हम मान लेते थे कि आज सूरज देर से डूबा
तो कल का दिन अच्छा होगा
आज तुम्हें सपने में दिखा हिरण
तो कल जी रहेगा ठीक-ठीक सा

मैं तुम्हें ठीक करने किसी पहाड़ पर ले जाना चाहता था
तुम पोंछना चाहती थी मेरे माथे का पसीना
जो लगातार बहता है अब भी देखो,
तुम ठीक कहती थी कि मेरे सिर में है कोई झरना
तुम ठीक कहती थी कि कभी नहीं सिखाऊँगा मैं तुम्हें साइकिल

और मुझे हँसी आती थी तब



बच्चों की पहुँच से दूर रखें

(यह कहानी आउटलुक पत्रिका के नवम्बर, 2011 अंक में छपी है)
By Sally Mann
हम ऐसा कहते ज़रूर थे कि हमारी जान निकल जाएगी लेकिन वो निकलती नहीं थी। जब वे मुझे मारते थे तो मैं बचाव के लिए किसी चीज का इस्तेमाल नहीं करता था। ऐसे दीवार की तरह आँगन के बीचोंबीच खड़ा रहता जैसे मुझे कोई नहीं हिला सकता। मैं कोई देवता नहीं था कि किसी अस्त्र से उनकी गालियों और लाठियों को वापस लौटा सकूं। वे मेरे शरीर और आत्मा में उतरती थीं और छिपकर बैठ जाती थीं। लेकिन मैं खड़ा रहता था, आँखें पूरी खोले। मुझे एक भी दृश्य नहीं भूलना था।



आसमान सबका पर मेरी छत से दिखता थोड़ा

एक आदमी बाघ से बचते हुए मारता बकरी
मैं तोते को बचाता हुआ एक तस्वीर में
दुनिया वैसी ही ठंडी
आसमान सबका पर मेरी छत से दिखता थोड़ा



बार-बार रोटी

खामखां एक चिट्ठी जेब में महीनों दुनिया के नाम
दुनिया का पता सबसे छोटा, सबसे बेकार
क्योंकि हर कोई ले सकता उसके ख़त को लेकिन लेता कोई नहीं
जिससे सब प्यार करते
उससे कोई नहीं पूछता कि क्या खाया

जिसके पाँच पति, उसका एक भी नहीं पूरा